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शिमला समझौते पर पाकिस्तान की पलटी! विदेश मंत्रालय का नरम रुख आया सामने

इस्लामाबाद/नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान के बीच लगातार बढ़ते तनाव के बीच अब पाकिस्तान के रुख में नरमी देखने को मिली है। शिमला समझौते को लेकर एक ओर जहां पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इसे “निरर्थक दस्तावेज” बताया था, वहीं अब पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि अब तक भारत के साथ किसी भी द्विपक्षीय समझौते को रद्द नहीं किया गया है


🗣 विदेश मंत्रालय ने दिया बयान, ख्वाजा आसिफ से असहमति

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयानों से उलट, अब विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने साफ किया है कि शिमला समझौते सहित सभी द्विपक्षीय समझौते अब भी लागू हैं। उन्होंने ‘एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ को बताया:

“भारत की हालिया गतिविधियों ने जरूर चर्चाओं को जन्म दिया है, लेकिन पाकिस्तान ने अब तक कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया है। सभी द्विपक्षीय समझौते यथावत प्रभाव में हैं।”

इस बयान ने यह संकेत दे दिया है कि भारत के साथ कूटनीतिक दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।


🔥 क्या कहा था ख्वाजा आसिफ ने?

ख्वाजा आसिफ ने एक दिन पहले तीखा बयान देते हुए दावा किया था कि:

“शिमला समझौता अब कोई मायने नहीं रखता। द्विपक्षीय बातचीत की प्रणाली टूट चुकी है और अब हमें समाधान अंतरराष्ट्रीय मंचों से ही खोजने होंगे।”

उन्होंने सिंधु जल संधि पर भी सवाल उठाए और संकेत दिए कि अगर शिमला समझौता खत्म हो गया, तो अन्य समझौतों की वैधता पर भी सवाल उठेंगे।


📜 क्या है शिमला समझौता?

1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद 2 जुलाई 1972 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच यह समझौता हुआ था। इसका उद्देश्य था कि दोनों देश आपसी विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाएं और शांति बहाली की दिशा में कदम उठाएं।

समझौते के प्रमुख बिंदु:

  • कश्मीर सहित सभी द्विपक्षीय मुद्दे आपसी बातचीत से सुलझाए जाएंगे

  • युद्धबंदी की रेखा को लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) के रूप में मान्यता दी गई

  • दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करेंगे


🔎 निष्कर्ष: बयानबाज़ी में उलझा पाकिस्तान?

भारत द्वारा आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाए जाने के बाद पाकिस्तान ने शुरू में शिमला समझौते को खत्म करने का इशारा दिया था, लेकिन अब जब राजनयिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा, तो पाकिस्तान एक बार फिर बैकफुट पर आ गया है। यह दिखाता है कि भले ही बयान तीखे हों, लेकिन वास्तविकता में समझौतों को तोड़ना इतना आसान नहीं होता।

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