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एन्हर्टू (Enhertu) नाम की कैंसर की दवा कई मरीजों के लिए नई उम्मीद बनकर आई है। यह दवा खास तौर पर एडवांस स्टेज ब्रेस्ट कैंसर में काफी असरदार मानी जाती है। इसके अलावा कुछ मामलों में पेट और फेफड़ों के कैंसर में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। भारत में इसके आने से मरीजों की जिंदगी कुछ लंबी और बेहतर जरूर हुई है, लेकिन इसकी कीमत अब भी सबसे बड़ी परेशानी बनी हुई है।
कितनी महंगी है यह दवा?
एन्हर्टू का इलाज मरीज के वजन पर निर्भर करता है।
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सालाना खर्च 50 लाख से 1 करोड़ रुपये से ज्यादा तक हो सकता है।
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करीब 60 किलो वजन वाले मरीज के लिए इलाज का खर्च लगभग 1.13 करोड़ रुपये सालाना बैठता है।
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दवा की एक शीशी की कीमत करीब 1.67 लाख रुपये है और इसे हर तीन हफ्ते में लेना पड़ता है।
यानी इलाज मौजूद है, लेकिन आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर है।
टैक्स हटाया गया, फिर भी राहत क्यों नहीं?
सरकार ने बजट 2024 में एन्हर्टू जैसी कुछ महंगी कैंसर दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी हटा दी थी। इसके बाद बजट 2026 में और भी कई कैंसर व दुर्लभ बीमारियों की दवाओं पर टैक्स छूट दी गई। मकसद था कि दवाएं सस्ती हों और मरीजों को राहत मिले।
लेकिन हकीकत यह है कि कीमतों में कोई बड़ी कमी नहीं आई। विशेषज्ञों के अनुसार, पेटेंट वाली दवाओं पर टैक्स हटाने से सिर्फ थोड़ी-सी राहत मिलती है, असली कीमत पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ता।
इलाज है, लेकिन पहुंच नहीं
भारत में हर साल करीब 15 लाख नए कैंसर मरीज सामने आते हैं और 9 लाख से ज्यादा लोगों की मौत कैंसर से होती है। इसके बावजूद सिर्फ 3 प्रतिशत से भी कम मरीजों को इम्यूनोथेरेपी या ऐसी नई दवाएं मिल पाती हैं, क्योंकि ये बेहद महंगी हैं।
डॉक्टर मानते हैं कि नई टारगेटेड और इम्यूनोथेरेपी दवाओं ने कैंसर इलाज की दिशा बदल दी है, लेकिन भारत में इनकी कीमतें इतनी ज्यादा हैं कि ज्यादातर मरीज इनके बारे में सोच भी नहीं पाते।
टैक्स छूट का फायदा किसे मिलता है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि टैक्स छूट का असली फायदा सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को मिलता है, जैसे CGHS और ESIC। इन योजनाओं में शामिल मरीजों को दवाएं मुफ्त मिल जाती हैं और सरकार का खर्च कुछ कम हो जाता है।
लेकिन जो मरीज अपनी जेब से इलाज कराता है, उसके लिए टैक्स छूट से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक,
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सरकार को दवा कंपनियों से सीधे कीमत पर बातचीत करनी चाहिए।
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कैंसर को पूरे देश में नोटिफायबल बीमारी घोषित किया जाना चाहिए।
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तभी महंगी दवाएं आम मरीजों की पहुंच में आ पाएंगी।
कुल मिलाकर, एन्हर्टू जैसी दवाएं उम्मीद तो देती हैं, लेकिन जब तक कीमतें काबू में नहीं आतीं, तब तक यह उम्मीद सिर्फ चुनिंदा लोगों तक ही सीमित रहेगी।
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