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कोटा में चन्द्रलोई नदी और रायपुरा नाले में रहने वाले मगरमच्छों का रंग सफेद हो गया है। इसका कारण नदी के पानी में लगातार बढ़ता प्रदूषण है। कोटा स्टोन फैक्ट्रियों से निकलने वाली स्लरी (पत्थर काटने से निकला सफेद मलबा) और केमिकल वाले पानी के संपर्क में रहने से मगरमच्छों की त्वचा का रंग बदल रहा है।
100 से ज्यादा मगरमच्छ हो रहे प्रभावित
चन्द्रलोई नदी, जो अलनिया बांध से शुरू होकर चंबल नदी में मिलती है, और रायपुरा नाले में 100 से ज्यादा मगरमच्छ रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार स्लरी और केमिकल वाले पानी में रहने से उनकी त्वचा सफेद हो गई है। जब ये मगरमच्छ दूसरे साफ पानी वाले इलाकों में जाते हैं, तो उनका रंग फिर से सामान्य हो जाता है।
मगरमच्छों की रहस्यमयी मौतें
पिछले साल चन्द्रलोई नदी में आधा दर्जन मगरमच्छों की रहस्यमयी मौत हो गई थी। अभी तक उनकी मौत के सही कारण सामने नहीं आ पाए हैं। यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक भी पहुंचा था, और जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। इससे पहले भी 2022 में कई मगरमच्छों की असमय मौत हो चुकी है।
क्रोकोडाइल पार्क का सपना अधूरा
सरकार ने यहां मगरमच्छों की सुरक्षा के लिए एक ‘क्रोकोडाइल पार्क’ बनाने का प्रस्ताव भी तैयार किया था, ताकि मगरमच्छ सुरक्षित घूम सकें। लेकिन यह योजना अब तक कागजों में ही अटकी हुई है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
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आदिल सैफ (वाइल्डलाइफ कंजर्वेशनिस्ट) का कहना है कि फैक्ट्रियों से निकलने वाला कैमिकल वाला पानी मगरमच्छों के रंग को बदल रहा है। संबंधित विभागों को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए।
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डॉ. अखिलेश पांडेय (उपनिदेशक, जिला पशु चिकित्सालय) ने कहा कि स्लरी और कैमिकल के प्रभाव से मगरमच्छों की त्वचा सफेद हो रही है। अगर वे लगातार प्रदूषित पानी में रहेंगे तो उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है। इनके शरीर में कैमिकल जमा होने से लंबे समय में गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।
निष्कर्ष
अगर नदी में प्रदूषण को जल्द नहीं रोका गया तो इससे न केवल मगरमच्छों की सेहत पर बुरा असर पड़ेगा, बल्कि पूरे नदी तंत्र को भी नुकसान होगा। संबंधित विभागों को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।
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