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धारवाड़: कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ के छात्र कल्याण विभाग के डीन और हिंदी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर सीताराम के. पवार ने राजस्थान पत्रिका से खास बातचीत में बताया कि अब छात्र शोध के लिए नए और ज्वलंत मुद्दों को चुन रहे हैं।
उन्होंने कहा कि किसान और मजदूरों की आत्महत्या, समकालीन साहित्य में पर्यावरण, और किसानों के संघर्ष जैसे विषयों पर रिसर्च हो रही है। लगभग 25 छात्र पीएचडी कर रहे हैं।
🔖 हिंदी की पढ़ाई के लिए महाराष्ट्र और गोवा से भी छात्र
पवार ने बताया कि हिंदी विभाग में स्नातकोत्तर (PG) की सभी सीटें भर जाती हैं। कर्नाटक के साथ-साथ महाराष्ट्र और गोवा से भी छात्र यहाँ पढ़ाई के लिए आते हैं। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में 6,000 से ज्यादा हिंदी किताबें मौजूद हैं।
छात्रों को स्किल डिवेलपमेंट और पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट की ट्रेनिंग भी दी जाती है। यहाँ पीजी डिप्लोमा कोर्स भी चल रहा है।
बेंगलुरु, मैसूरु, मेंगलूरु, कलबुर्गी और कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी में भी हिंदी की पढ़ाई होती है।
🌍 अंतरराष्ट्रीय स्तर की कॉन्फ्रेंस
पिछले 5 सालों में 5 अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस हो चुकी हैं। साल 2023 में आजादी के अमृत महोत्सव पर स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय साहित्य के योगदान विषय पर एक बड़ी कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें अमेरिका, नार्वे, नेपाल समेत 30 प्रोफेसर शामिल हुए।
🎶 धारवाड़ – कला और साहित्य का केंद्र
प्रो. पवार ने बताया कि धारवाड़ को दक्षिण भारत की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है। यहाँ भीमसेन जोशी, गंगूबाई हांगल, मल्लिकार्जुन मंसूर जैसे महान संगीतकार जन्मे हैं।
इस विश्वविद्यालय से पाँच ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता निकले हैं – विक्रम गोकाक, दरा बेन्द्रे, गिरिश कर्नाड, चंद्रशेखर कम्बार समेत कई साहित्यकार।
🏫 हिंदी विभाग की शुरुआत और पवार का योगदान
हिंदी विभाग की शुरुआत 1959-60 में प्रो. राधाकृष्ण मुदलियार के नेतृत्व में हुई थी। वे 18 भाषाओं के ज्ञाता थे। 1971 में विभाग को स्थायी रूप से विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित किया गया।
प्रो. सीताराम पवार को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं, जैसे – गुरुकुल तिलक पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि सम्मान, महात्मा गांधी पुरस्कार आदि।
📚 70 शोध पत्र और कई अनुवाद कार्य
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प्रो. पवार के अब तक 70 शोध पत्र, जिनमें से 20 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुके हैं।
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कई पुस्तकों और रेडियो नाटकों का अनुवाद किया है।
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हिंदी और कन्नड़ साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित कई किताबें प्रकाशित की हैं।
प्रमुख पुस्तकें:
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त्रिवेणी के साहित्य का विवेचनात्मक अध्ययन
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मन्नु भंडारी के कथा साहित्य पर विश्लेषण
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दलित संवेदना पर आधारित हिंदी-कन्नड़ उपन्यासों का अध्ययन
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कबीर के दार्शनिक विचार
निष्कर्ष: कर्नाटक विश्वविद्यालय धारवाड़ आज भी साहित्य, शोध और भाषा विकास के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है। यहाँ के शोधार्थी समसामयिक मुद्दों पर काम कर रहे हैं और दूसरे राज्यों से छात्र यहां पढ़ने आ रहे हैं।
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