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अतीत

क्या अतीत को ज़िंदा किया जा सकता है?

एक विलुप्त प्रजाति की वापसी की कोशिश

कल्पना कीजिए कि हजारों साल पहले विलुप्त हो चुके जानवर आज फिर से हमारे सामने ज़िंदा खड़े हों — यह अब केवल विज्ञान कथा नहीं रह गई है। अमेरिका की बायोटेक कंपनी कोलोसल बायोसाइंसेज़ ने हाल ही में कुछ ऐसा ही करके दिखाया है। कंपनी ने प्राचीन और अब विलुप्त हो चुकी भेड़िये की प्रजाति डायर वुल्फ़ के डीएनए की मदद से तीन पिल्लों को जन्म दिया है, जिनके नाम रोमियोलस और रीमस रखे गए हैं। ये नाम रोमन मिथकों के दो जुड़वां भाइयों से प्रेरित हैं, जिन्हें एक मादा भेड़िये ने पाला था।

कैसे हुआ यह चमत्कार?

इस प्रयोग के पीछे की कहानी जटिल लेकिन रोमांचक है। वैज्ञानिकों को डायर वुल्फ़ की एक खोपड़ी और एक दांत मिला, जो लगभग 72,000 और 13,000 साल पुराने थे। इनसे निकाले गए डीएनए के अंशों को आधुनिक ग्रे वुल्फ़ के डीएनए से मिलाया गया ताकि एक समान जीव तैयार किया जा सके। इस संशोधित जीनोम को कुत्तों की कोशिकाओं में डालकर भ्रूण बनाया गया और फिर इन भ्रूणों को पालतू कुत्तियों के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर विकसित किया गया।

इन पिल्लों का जन्म सी-सेक्शन (ऑपरेशन) से हुआ। हालांकि, ये शुद्ध डायर वुल्फ़ नहीं हैं, बल्कि इन्हें “प्रॉक्सी डायर वुल्फ़” कहा जा सकता है — यानी मूल प्रजाति से मिलती-जुलती लेकिन हूबहू वही नहीं।

क्या यह सही है?

इस प्रयोग ने विज्ञान की दुनिया में आश्चर्य के साथ-साथ कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। क्या विलुप्त प्रजातियों को दोबारा ज़िंदा करना नैतिक रूप से सही है? क्या हम इस प्रक्रिया से ‘प्रकृति के भगवान’ बनने की कोशिश कर रहे हैं?

फिलॉसफर डॉ. जे ओडेनबो इस पर सवाल उठाते हैं कि अगर हम जानते हैं कि किसी प्रजाति को वापस लाया जा सकता है, तो क्या इससे संरक्षण के प्रयासों को नुकसान होगा? लोग सोच सकते हैं कि विलुप्त होना अब स्थायी नहीं है, और इसलिए प्रजातियों को बचाने की कोशिशों में ढील दी जा सकती है।

क्या यह संभव है?

प्राचीन प्रजातियों को पुनर्जीवित करना आसान नहीं है। एक पुराना डीएनए मानो किसी जले हुए उपन्यास के टुकड़े-टुकड़े पन्नों को जोड़ कर पूरी कहानी समझने जैसा है। फिर भी, 2012 में आई CRISPR-Cas9 तकनीक ने जीन एडिटिंग को पहले से कहीं ज्यादा सटीक और सुलभ बना दिया। इसी तकनीक की मदद से डायर वुल्फ़ पिल्लों को जीवन मिला।

आज दुनिया भर में कई वैज्ञानिक समूह मैमथ, उत्तरी सफेद गैंडा और पैसेंजर पिजन जैसी विलुप्त या विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजातियों को वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या ये प्रयोग वास्तव में मदद करेंगे?

यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या ऐसे प्रयोग धरती की जैव विविधता को बचा सकते हैं। आज लगभग 48% जीवित प्रजातियों की आबादी घट रही है। अगर यह गिरावट इसी रफ्तार से जारी रही, तो हम एक और महाविलुप्ति की ओर बढ़ सकते हैं — ठीक वैसे ही जैसे डायनासोर का अंत हुआ था।

पर्यावरणविदों का कहना है कि संरक्षण के बिना केवल तकनीक से हम दुनिया को नहीं बचा सकते। यदि किसी विलुप्त प्रजाति को दोबारा पैदा भी कर लिया जाए, और उन्हें जंगल में छोड़ा जाए, तो वे उसी खतरे का सामना करेंगे जिससे वो पहले विलुप्त हुए थे — अवैध शिकार, पर्यावरणीय बदलाव, या इंसानी हस्तक्षेप।

निष्कर्ष

डायर वुल्फ़ के तीन पिल्लों का जन्म एक ऐतिहासिक वैज्ञानिक उपलब्धि है, मगर इससे यह साबित नहीं होता कि विलुप्त प्रजातियाँ अब सुरक्षित हैं। यह एक शुरुआत है — संभावनाओं से भरी हुई, लेकिन कई जोखिमों और सवालों के साथ।

विलुप्त प्रजातियों को ज़िंदा करना आज भी एक वैज्ञानिक प्रयोग ही है, न कि समाधान। संरक्षण, सतर्कता और नैतिक विवेक ही इस तकनीक को सही दिशा दे सकते हैं।

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