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लीबिया संकट में तुर्की को बड़ा झटका, मिसराता गुट की पीठ पर वार

त्रिपोली, लीबिया — लीबिया की राजधानी त्रिपोली में हाल ही में हुए सशस्त्र टकराव ने न सिर्फ इस अशांत देश की राजनीतिक अस्थिरता को फिर से उजागर किया है, बल्कि तुर्की की क्षेत्रीय रणनीति को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। त्रिपोली में मिसराता समर्थक ताकतवर मिलिशिया प्रमुख की हत्या और उसके बाद उपजे हालात ने तुर्की समर्थित सुरक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीन हजार सैनिक, फिर भी असहाय तुर्की?

माना जा रहा है कि तुर्की ने त्रिपोली की राष्ट्रीय एकता सरकार (GNU) को समर्थन देने के लिए लगभग 3,000 सैनिकों को लीबिया भेजा था। इसका उद्देश्य था त्रिपोली को स्थिर रखना और मिसराता से जुड़े गुटों को ताकत देना। लेकिन हालिया घटनाओं से तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है — तुर्की समर्थित लड़ाके घटनाक्रम को मूकदर्शक की तरह देखते रहे, जबकि उनके सबसे मजबूत गुट के नेताओं में से एक की त्रिपोली में हत्या कर दी गई।

घनीवा की हत्या और भड़की आग

त्रिपोली के अबू सलीम इलाके में सोमवार रात से लेकर मंगलवार सुबह तक भीषण संघर्ष छिड़ा, जिसकी चिंगारी बनी SSA (Stabilization Support Authority) के प्रमुख अब्देल घनी अल-किकली की हत्या। घनीवा के नाम से मशहूर यह मिलिशिया कमांडर त्रिपोली में बेहद प्रभावशाली माने जाते थे। आरोप है कि उन्हें 444 ब्रिगेड के कब्जे वाले इलाके में मार दिया गया — यह वही ब्रिगेड है जिसके प्रमुख माने जाते हैं प्रधानमंत्री दबैबा के करीबी माने जाने वाले महमूद हम्जा

मिसराता की रीढ़ टूटी?

मिसराता, तुर्की की लीबिया नीति का अहम केंद्र बिंदु रहा है। एक रणनीतिक बंदरगाह वाला यह शहर न केवल सैन्य सपोर्ट हब रहा है, बल्कि तुर्की की उपस्थिति को भी मजबूत करता रहा है। मगर अब वहीं के लड़ाके त्रिपोली की सड़कों पर मारे जा रहे हैं, और तुर्की की फौज हस्तक्षेप नहीं कर पा रही। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि मिसराता की पकड़ अब ढीली पड़ती जा रही है।

कूटनीति में भी झटका

यह महज सैन्य असफलता नहीं है, बल्कि तुर्की की कूटनीति की कमजोरी भी सामने आई है। जिस त्रिपोली सरकार को एर्दोआन प्रशासन ने समर्थन दिया था, अब उसी सरकार के मातहत गुट तुर्की समर्थित मिलिशिया के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं। इससे तुर्की की लीबिया नीति और उसके दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य, दोनों पर पुनर्विचार की आवश्यकता खड़ी हो गई है।

क्या एर्दोआन की लीबिया नीति धराशायी हो रही है?

2011 में गद्दाफी की सरकार गिरने के बाद तुर्की ने लीबिया में खुद को एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन अब हालात यह इशारा कर रहे हैं कि तुर्की की रणनीतिक पकड़ ढीली पड़ रही है और वहां की सरकार से उसका समीकरण भी संतुलन खो चुका है।

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