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व्हाइट हाउस सलाहकार समिति में पूर्व चरमपंथियों की नियुक्ति से उठे सवाल, एक का संबंध रहा लश्कर-ए-तैयबा से

वॉशिंगटन: अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा गठित “Lay Leaders Advisory Board” में दो ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की गई थी, जिनमें से एक का अतीत एक चरमपंथी संगठन से जुड़ा हुआ रहा है। इस बोर्ड का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता और समुदायों के बीच संवाद को बढ़ावा देना बताया गया है, लेकिन कुछ नामों पर उठते सवालों ने इस समिति की विश्वसनीयता और अमेरिकी नीति को लेकर बहस छेड़ दी है।


नियुक्त व्यक्तियों पर क्या हैं आरोप?

1. इस्माइल रॉयर (Ismail Royer):

इस्माइल रॉयर एक अमेरिकी नागरिक हैं, जो 1990 के दशक के अंत में मुस्लिम युवाओं को चरमपंथी गतिविधियों से जोड़ने के लिए जाने जाते थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2000 में पाकिस्तान जाकर लश्कर-ए-तैयबा के प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया और कथित रूप से कश्मीर में भारतीय सैन्य ठिकानों पर हमलों में भी शामिल रहे।

  • 2003 में उन्हें अमेरिका में आतंकवाद संबंधी आरोपों में दोषी पाया गया और 20 साल की सजा सुनाई गई थी, जिसमें से लगभग 13 साल जेल में बिताने के बाद वे बाहर आए।

  • जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने धार्मिक संवाद और सहिष्णुता को बढ़ावा देने का दावा करते हुए खुद को सुधारा हुआ बताया और Center for Islam and Religious Freedom में निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।

2. शेख हमजा यूसुफ (Shaykh Hamza Yusuf):

हमजा यूसुफ एक प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान माने जाते हैं और कैलिफोर्निया स्थित ज़ैतूना कॉलेज के सह-संस्थापक हैं, जो अमेरिका का पहला मान्यता प्राप्त इस्लामिक लिबरल आर्ट्स कॉलेज है।

  • हालांकि वह उदारवादी छवि के लिए जाने जाते हैं, उनके कुछ पूर्व बयान अमेरिकी विदेश नीति और इस्लामी कट्टरपंथ पर आलोचनात्मक रहे हैं, जिस कारण उन्हें विवादास्पद माना गया है।


भारत और वैश्विक समुदाय की प्रतिक्रिया

भारत में कई सुरक्षा विश्लेषकों और विदेश नीति विशेषज्ञों ने इस नियुक्ति पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों से जुड़े किसी भी व्यक्ति को व्हाइट हाउस के स्तर पर जगह देना कूटनीतिक असंवेदनशीलता का संकेत है, विशेषकर जब यह संगठन भारत में कई आतंकी हमलों में शामिल रहा है।


अमेरिका के भीतर उठी आवाजें

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों और ट्रंप के कई राजनीतिक विरोधियों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उनका मानना है कि पूर्व चरमपंथियों को सलाहकार भूमिका में नियुक्त करना अमेरिका की सुरक्षा नीति को कमजोर कर सकता है और गलत मिसाल पेश करता है।


ट्रंप प्रशासन का पक्ष

ट्रंप प्रशासन की ओर से दिए गए बयान में कहा गया कि यह बोर्ड धार्मिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति यह दर्शाती है कि पुनर्वास और बदलाव संभव है, और अतीत में गलती कर चुके लोग भी समाज की भलाई में योगदान दे सकते हैं।


एक व्यापक बहस का विषय

यह मामला केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक और नीति-आधारित बहस का कारण भी बना है:

  • क्या पूर्व चरमपंथी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने योग्य हैं?

  • क्या पुनर्वास की प्रक्रिया से समाज को लाभ मिल सकता है या यह खतरनाक उदाहरण बन सकती है?

इस प्रकरण ने अमेरिका और अन्य देशों में आतंकवाद विरोधी नीतियों, पुनर्वास कार्यक्रमों, और नैतिक जिम्मेदारी पर नए सिरे से चर्चा की शुरुआत कर दी है।

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