नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव अब और अधिक साफ नजर आने लगे हैं। एक ताजा वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि यदि वर्तमान रफ्तार से तापमान बढ़ता रहा, तो सदी के अंत तक हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र की लगभग 75% बर्फ खत्म हो सकती है। यह वही पर्वतीय क्षेत्र है जो एशिया की प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है, जिन पर करीब 2 अरब लोगों की आजीविका निर्भर करती है।
ग्लोबल वॉर्मिंग के क्या हैं अनुमानित प्रभाव?
‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों में व्यापक गिरावट देखने को मिलेगी।
वहीं अगर तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए, जैसा कि 2015 के पेरिस समझौते में लक्ष्य तय किया गया था, तो ग्लेशियरों की लगभग 40-45% बर्फ संरक्षित की जा सकती है।
अन्य पर्वतीय क्षेत्रों का भविष्य और भी चिंताजनक
अध्ययन के अनुसार, यूरोपीयन आल्प्स, पश्चिमी अमेरिका, कनाडा और आइसलैंड जैसी पर्वत श्रृंखलाएं भी इस संकट से अछूती नहीं रहेंगी।
इन क्षेत्रों में अगर तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो 90% तक बर्फ गायब हो सकती है, और स्कैंडिनेविया क्षेत्र में तो पूरी बर्फ समाप्त हो जाने की आशंका है।
ग्लेशियरों के पिघलने का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं
ग्लेशियर केवल बर्फ की चट्टानें नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं। नदियों का जल प्रवाह, पीने का पानी, खेती-बाड़ी, जल विद्युत – सब कुछ इन पर निर्भर है।
एशियाई विकास बैंक के उपाध्यक्ष यिंगमिंग यांग ने कहा कि “पिघलते ग्लेशियर एशिया में 2 अरब से ज्यादा लोगों की आजीविका को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं।”
दुशांबे में ग्लेशियर संकट पर पहली वैश्विक बैठक
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में पहली बार ग्लेशियरों पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। यह सम्मेलन ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में हो रहा है, जिसमें 50 से अधिक देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।
भविष्य की दिशा आज के फैसलों पर निर्भर
अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिकों में से एक, डॉ. हैरी जेकोलारी ने चेताया कि “जो फैसले हम आज लेंगे, वे सदियों तक प्रभाव छोड़ेंगे। हर छोटी-बड़ी तापमान वृद्धि का अर्थ है – ग्लेशियरों की रक्षा हो सकती है या उनका खात्मा तय हो सकता है।”
निष्कर्ष:
हिंदू कुश और अन्य पर्वत श्रृंखलाओं से बर्फ का यूँ गायब होना केवल जलवायु विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन और भविष्य का सवाल है। अगर अभी कार्बन उत्सर्जन नहीं घटाया गया और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ पानी ही नहीं, जिंदगी भी खतरे में होगी।
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