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क्या इज़राइल की कार्रवाई से भारत की विदेश नीति मुश्किल में है?

पिछले कुछ हफ्तों में इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक राजनीति को और अधिक ध्रुवीकृत बना दिया है। इसी पृष्ठभूमि में भारत की स्थिति जटिल होती जा रही है।

जहां पाकिस्तान के मामले में भारत और इज़राइल एकजुट नजर आते हैं—विशेष रूप से जब भारत ने हाल ही में पाकिस्तान के कुछ इलाकों में सीमित सैन्य कार्रवाई की थी—वहीं ईरान को लेकर भारत की नीति कहीं अधिक संतुलित रही है। ईरान से भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा साझेदारी से जुड़े गहरे संबंध हैं।

संतुलन की नीति पर सवाल

भारत पारंपरिक रूप से पश्चिम एशिया में एक संतुलनकारी भूमिका निभाता रहा है—इज़राइल, खाड़ी के अरब देश और ईरान के बीच। लेकिन हाल के घटनाक्रम इस संतुलन को कठिन बना रहे हैं। उदाहरण के लिए, 12 जून को संयुक्त राष्ट्र महासभा में ग़ज़ा में युद्धविराम पर हुई वोटिंग में भारत ने मतदान से दूरी बना ली, जबकि 149 देशों ने युद्धविराम के पक्ष में मतदान किया।

भारत के साथ वोटिंग से दूर रहने वाले बाकी 18 देश अधिकांशतः छोटे और वैश्विक मंचों पर सीमित प्रभाव वाले हैं। इसके विपरीत, मतदान करने वाले अधिकांश प्रभावशाली देश—जैसे जापान, जर्मनी, फ्रांस और चीन—युद्धविराम के समर्थन में थे।

बहुपक्षीय मंचों पर अलग-थलग

भारत का यह रुख़ बहुपक्षीय संगठनों में भी अलग-थलग दिखता है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) ने 14 जून को इज़राइली हमले की निंदा की, लेकिन भारत ने खुद को इस बयान से अलग रखा। यही रुख़ BRICS में भी नजर आया, जहां भारत और इथियोपिया दो ऐसे देश थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में मतदान से दूरी बनाए रखी, जबकि बाकी सदस्य देशों ने युद्धविराम का समर्थन किया।

इसी तरह, क्वाड (QUAD) के सदस्य ऑस्ट्रेलिया और जापान ने युद्धविराम के समर्थन में वोट दिया, लेकिन भारत ने नहीं।

चुप्पी भी एक बयान बन जाती है

भारत की चुप्पी अब वैश्विक मंच पर ध्यान आकर्षित कर रही है। भारत के पूर्व राजनयिक सैयद अकबरुद्दीन ने Times of India में लिखा कि जब किसी देश की हैसियत बढ़ती है, तो दुनिया उस देश की ‘चुप्पी’ को भी संदेश की तरह देखती है। अब भारत से यह अपेक्षा की जाती है कि वह न सिर्फ़ कार्रवाई करे, बल्कि स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति भी जाहिर करे।

कूटनीतिक संतुलन या रणनीतिक असमंजस?

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल का मानना है कि इज़राइल के साथ गहरे होते संबंध और SCO/BRICS जैसे मंचों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की विश्लेषक तन्वी मदान का कहना है कि भारत इस वक्त “स्पष्ट समर्थन” देने से तो बच रहा है, लेकिन उसकी चुप्पी से यह आभास भी हो रहा है कि वह एक पक्ष की ओर झुका हुआ है।

भारत और ईरान: एक अनिश्चित मित्रता

हालांकि भारत और ईरान के बीच सभ्यता-स्तरीय संबंध रहे हैं, लेकिन भूराजनैतिक दबावों और अमेरिका के प्रभाव के कारण भारत ने कई बार तेहरान के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने में झिझक दिखाई है। ईरान, ब्रिक्स और एससीओ दोनों का सदस्य है, और रूस जैसे पारंपरिक मित्र भी इज़राइली हमले की निंदा कर चुके हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारत का मौन रहना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।


निष्कर्ष:
आज की ध्रुवीकृत विश्व राजनीति में भारत की “संतुलनकारी नीति” अब उतनी सहज नहीं रही। जब देश की अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ती है, तो उस पर दुनिया की नजर भी तेज हो जाती है—न केवल उसके कदमों पर, बल्कि उसकी चुप्पी पर भी। भारत को अब अधिक स्पष्ट, सैद्धांतिक और दूरदर्शी कूटनीति अपनाने की ज़रूरत है, जिससे वह अपनी पुरानी नीति—’सबसे मित्रता, किसी से वैर नहीं’—को नए संदर्भों में सही रूप में लागू कर सके।

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