पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग ने वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन को हिला दिया है। जैसे-जैसे इज़राइल ईरान पर सैन्य बढ़त बनाता दिख रहा है, वैसे-वैसे यह सवाल जोर पकड़ रहा है — भारत पर इसका असर क्या होगा?
इतिहास से जुड़ा रिश्ता, लेकिन आज की ज़रूरतें अलग
ईरान और भारत कभी 900 किलोमीटर से अधिक लंबी सरहद साझा करते थे, लेकिन विभाजन के बाद यह सीमा पाकिस्तान के हिस्से में चली गई। हालांकि, संस्कृति, भाषा और परंपरा की साझेदारी आज भी दोनों देशों को जोड़ती है।
भारत और ईरान के बीच 1950 में राजनयिक संबंध बने, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहा। इधर, पिछले एक दशक में भारत का झुकाव इज़राइल की ओर साफ देखा गया है — रक्षा, तकनीक और खुफिया सहयोग के क्षेत्रों में।
क्या ईरान का कमज़ोर होना भारत के लिए चिंता का कारण है?
दिल्ली के जेएनयू में वेस्ट एशियन स्टडीज के प्रोफेसर अश्विनी महापात्रा मानते हैं कि अगर ईरान क्षेत्र में कमजोर पड़ता है, तो बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) का सपना कमजोर होगा। भारत की नीति शुरू से ऐसे वर्ल्ड ऑर्डर को समर्थन देती रही है, जहां एक देश (जैसे अमेरिका) पूरी दुनिया पर हावी न हो।
महापात्रा कहते हैं, “ईरान की कमजोरी से इज़राइल या अमेरिका की पकड़ पश्चिम एशिया में स्थायी नहीं होगी। इस क्षेत्र की जियोपॉलिटिक्स जटिल है और यहां पर लंबे समय तक किसी एक का दबदबा नहीं चल सकता।”
भारत का द्वंद्व: इज़राइल से रक्षा सहयोग, ईरान से भू-राजनीतिक ज़रूरत
भारत के लिए इज़राइल अहम रक्षा सहयोगी बन चुका है। मिसाइल डिफेंस सिस्टम, ड्रोन तकनीक और खुफिया साझेदारी जैसे क्षेत्रों में इज़राइल भारत को लगातार सपोर्ट कर रहा है। वहीं दूसरी ओर, ईरान भारत के लिए एक ज़रूरी लिंक है — खासकर पाकिस्तान को बायपास कर मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक व्यापारिक पहुंच के लिए।
चाबहार पोर्ट, जो भारत-ईरान सहयोग का बड़ा प्रतीक था, आज ठप पड़ा है। न तो वहां पर कोई ठोस निवेश हो रहा है, न ही कनेक्टिविटी पर ठोस काम।
पूर्व राजनयिक तलमीज़ अहमद कहते हैं, “ईरान के साथ भारत की दिलचस्पी बहुत सीमित हो गई है। तेल नहीं खरीदते, गैस की कोई साझेदारी नहीं, चाबहार पर प्रगति नहीं — ईरान को संदेश साफ है कि भारत अब बहुत दूर है।”
विदेश नीति बनाम घरेलू राजनीति?
पूर्व एनएसए शिवशंकर मेनन का कहना है कि भारत की विदेश नीति पर घरेलू राजनीतिक प्राथमिकताओं का असर बढ़ गया है। वे चेताते हैं कि पश्चिम एशिया में 90 लाख से ज़्यादा भारतीय काम करते हैं और अरबों डॉलर हर साल भारत भेजते हैं। युद्ध और अस्थिरता उनके लिए खतरा है।
भारत की चुप्पी: रणनीति या भ्रम?
भारत ने ईरान पर इज़राइली हमले की आलोचना नहीं की, यहां तक कि हाल ही में एससीओ के संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने से भी मना कर दिया, जिसमें इज़राइल की आलोचना की गई थी। आलोचकों के मुताबिक यह भारत के संतुलनवादी रुख से हटकर एकतरफा झुकाव को दर्शाता है।
डॉ. मुदस्सिर क़मर, JNU के असिस्टेंट प्रोफेसर, मानते हैं कि भारत फिलहाल इज़राइल को प्राथमिकता दे रहा है — जो रक्षा, तकनीक और कूटनीतिक प्रभाव के लिहाज से अधिक उपयोगी है। वहीं ईरान भू-राजनीतिक दृष्टि से ज़रूरी है, लेकिन व्यावहारिक साझेदारी के मामले में पीछे है।
निष्कर्ष: भारत को अपनी भूमिका फिर से तय करनी होगी
ईरान अगर इस युद्ध में पीछे हटता है या कमजोर होता है, तो भारत के लिए पश्चिम एशिया में रणनीतिक स्पेस सिकुड़ सकता है। दूसरी ओर, अगर भारत एकतरफा किसी एक पक्ष की ओर झुकता है, तो इससे उसकी ग्लोबल साउथ लीडरशिप की साख को नुकसान पहुंच सकता है।
भारत को अब यह तय करना होगा कि वह केवल एक रक्षा सहयोगी के रूप में इज़राइल का समर्थन करेगा या एक संतुलित शक्ति के रूप में दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखेगा — ताकि पश्चिम एशिया में उसकी भूमिका एक तटस्थ, स्थिर और जिम्मेदार शक्ति की बनी रहे।
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