दिव्या देशमुख का नाम आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में छा गया है। नागपुर की यह होनहार लड़की सिर्फ 19 साल की उम्र में FIDE विमेंस वर्ल्ड कप जीतकर इतिहास रच चुकी है। इस बड़ी जीत के साथ ही वह भारत की चौथी महिला ग्रैंडमास्टर भी बन गई हैं।
दिव्या ने मात्र 7 साल की उम्र में शतरंज खेलना शुरू किया था। वह शुरू से ही बहुत तेज और आत्मविश्वासी खिलाड़ी रही हैं। आठ साल पहले, जब उन्होंने एक टूर्नामेंट जीता था, तब एक टीवी इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि क्या वह किसी खिलाड़ी से डरती हैं? उस पर दिव्या ने मुस्कुराते हुए कहा था, “शायद ये सच है” — यानी वह वाकई किसी से नहीं डरती थीं। इस बार फाइनल में दिव्या का सामना भारत की ही अनुभवी और वर्ल्ड रैपिड चैंपियन कोनेरू हंपी से हुआ। हंपी की उम्र दिव्या से लगभग दोगुनी है और वह बेहद अनुभवी खिलाड़ी मानी जाती हैं। लेकिन दिव्या ने न तो घबराहट दिखाई और न ही दबाव में आईं। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुकाबला खेला और हंपी की हर चाल का डटकर जवाब दिया। शनिवार और रविवार को खेले गए दो क्लासिक मैच ड्रॉ रहे, यानी बराबरी पर खत्म हुए। इसके बाद मुकाबला टाईब्रेकर में पहुंचा, जहां दिव्या ने शानदार खेल दिखाया और जीत हासिल की।
दिव्या देशमुख अब ग्रैंडमास्टर बनने वाली भारत की केवल चौथी महिला खिलाड़ी बन गई हैं। साथ ही, वह दुनिया की 88वीं महिला ग्रैंडमास्टर हैं। टूर्नामेंट की शुरुआत में कोई नहीं सोच सकता था कि इतनी कम उम्र में वह यह मुकाम हासिल करेंगी, लेकिन दिव्या ने सबको गलत साबित कर दिया।
इस जीत के बाद दिव्या देशमुख देशभर के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं। उनके खेल का आत्मविश्वास और धैर्य हर युवा खिलाड़ी को सिखाता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है।
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