इस्लामाबाद: पाकिस्तान की आर्थिक हालत दिनों-दिन बिगड़ती जा रही है। महंगाई आसमान छू रही है, आम आदमी की थाली से सब्ज़ी और चाय से चीनी तक गायब हो चुकी है। ऊपर से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त शर्तों ने पाकिस्तान सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। सरकार अब बजट भी IMF की शर्तों के मुताबिक बनाएगी, जिससे आम जनता पर आर्थिक बोझ और बढ़ेगा।
IMF की सख्त शर्तें: अब रियायत नहीं, सिर्फ वसूली
पाकिस्तान को IMF से नया कर्ज लेने के लिए 2026 का बजट उसकी निर्धारित शर्तों के अनुसार पास करना अनिवार्य होगा। इसमें शामिल हैं:
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टैक्स में कोई छूट नहीं दी जा सकती
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हर राज्य सरकार को कृषि आय पर टैक्स लगाने के नियमों में बदलाव करना होगा
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खाद और कीटनाशकों पर 5% फेडरल एक्साइज ड्यूटी (FED) लगाई जाएगी
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घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों का निजीकरण होगा
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बिजली और गैस की दरों में हर साल बढ़ोतरी होगी
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गैस की कीमतें साल में दो बार बढ़ेंगी
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बिजली पर टैक्स को स्थायी रूप से लागू करने के लिए कानून बनाया जाएगा
आम जनता बेहाल: न रोटी, न पानी, न राहत
इस समय पाकिस्तान की बड़ी आबादी भूख और प्यास से जूझ रही है। भोजन और पीने के पानी की उपलब्धता भी चुनौती बन गई है। रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी होती जा रही हैं — चीनी ₹200 प्रति किलो, टमाटर ₹400, नींबू ₹500 और शिमला मिर्च ₹180 तक पहुंच चुकी है। जहां आम आदमी की औसत आय ₹500 प्रतिदिन से भी कम है, वहां इतने महंगे दामों पर जीवन जीना असंभव होता जा रहा है।
जंग का शौक, जेब में छेद
पाकिस्तान ने हाल ही में भारत से टकराव के चलते भारी नुकसान उठाया। नूरखान एयरबेस की मरम्मत में सरकार का करोड़ों रुपये खर्च हो गया, जिससे बजट पूरी तरह बिगड़ गया। यह खर्च अब जनता से टैक्स और महंगी चीजों के माध्यम से वसूला जा रहा है।
भूख, कर्ज और भ्रम का खेल
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बाहरी कर्ज: $131 अरब, जो GDP का 42% है
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भूखमरी: 2 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी की कगार पर
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ग्लोबल हंगर इंडेक्स: पाकिस्तान 127 देशों में 109वें स्थान पर
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कुपोषण: 30% से अधिक लोग कुपोषित, जो हेल्थ इमरजेंसी की चेतावनी है
सरकार का प्रोपेगेंडा बनाम जमीनी सच्चाई
शहबाज सरकार और पाकिस्तान की सेना मीडिया और बयानबाजी के ज़रिए जनता को गुमराह कर रही है। प्रोपेगेंडा फैलाने में खर्च हो रहा पैसा वहीं जनता की जेब से निकाला जा रहा है। कटोरे से मिल रही अंतरराष्ट्रीय मदद भी विकास की बजाय सत्ता और सुरक्षा तंत्र में झोंक दी जा रही है।
निष्कर्ष: कर्ज़ का इलाज या नया ज़ख्म?
IMF से मिलने वाला नया ऋण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सुधार पाएगा या सिर्फ पुराने जख्मों को और गहरा करेगा? यह सवाल अभी अनुत्तरित है। लेकिन इतना तय है कि इसका बोझ सबसे ज्यादा वहां के आम नागरिक ही उठाएंगे — वो नागरिक जो पहले ही रोटी, पानी और दवा जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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