तेहरान/यरूशलम – ईरान और इजरायल के बीच हालिया संघर्ष ने जहां मध्य पूर्व की राजनीति को हिला दिया, वहीं इस्लामिक जगत की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए। लेकिन ऐसे वक्त में, जब तमाम इस्लामिक देश निंदा और शोक संदेशों तक सीमित रहे, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने बिना झुके अमेरिका और इजरायल को कड़ा संदेश दिया — और यही साहस उन्हें मुस्लिम समुदाय का नया आदर्श बना रहा है।
“सरेंडर नहीं करेंगे” – खामेनेई का साफ ऐलान
86 वर्षीय अली खामेनेई ने हर तरह की धमकी और जान के खतरे के बावजूद अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई। उन्होंने न केवल अपने देश की संप्रभुता की रक्षा की, बल्कि फिलिस्तीन के समर्थन में पूरी ताकत झोंक दी। उनका कहना था, “हम फिलिस्तीन के लिए आखिरी सांस तक लड़ते रहेंगे।” यह बयान ऐसे समय आया जब इजरायल और अमेरिका दोनों ने ईरान पर एक के बाद एक हमले तेज कर दिए थे।
सीजफायर से पहले भीषण हमले, फिर अमेरिकी दबाव
13 जून को इजरायल द्वारा ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर किए गए हमले के बाद दोनों देशों के बीच 10 दिन तक लगातार टकराव चला। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इजरायली शहरों पर अभूतपूर्व मिसाइल हमले किए। इस संघर्ष में जहां 600 ईरानी नागरिकों की मौत हुई, वहीं इजरायल ने 30 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की।
इस बीच 21 जून को अमेरिका ने भी सीधे दखल देते हुए नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे ईरानी परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनेई को निशाना बनाने की धमकी तक दे डाली।
“मेरी जान की कोई कीमत नहीं” – खामेनेई की ऐतिहासिक अपील
ट्रंप की धमकी के जवाब में खामेनेई ने देश को संबोधित किया और कहा कि उनका जीवन किसी भी इस्लामिक आदर्श से बड़ा नहीं है। उन्होंने उत्तराधिकारी तय कर दिए और जनता से कहा, “अगर मैं न भी रहूं, तो भी इस्लामिक गणराज्य के लिए डटे रहना होगा।” खामेनेई के इस ऐलान ने ईरानी जनता को और एकजुट कर दिया।
कतर में अमेरिकी बेस पर मिसाइलें – ईरान का जवाब
सीजफायर की बातचीत से पहले, ईरान ने कतर के अमेरिकी अल उदीद एयरबेस पर मिसाइल हमला कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। हालांकि यह हमला सांकेतिक था और जानमाल का नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इसके जरिए ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि वह न तो अमेरिका से डरता है और न ही झुकने वाला है।
खामेनेई: अकेले सही, लेकिन डटे रहे
जहां सऊदी अरब, तुर्की और कतर जैसे देश इजरायली हमलों पर सिर्फ निंदा तक सीमित रहे, वहीं ईरान ने फिलिस्तीन के लिए हर मोर्चे पर सक्रिय भागीदारी दिखाई। हिजबुल्लाह और हूती जैसे संगठनों की मदद से इजरायली मोर्चों पर दबाव बनाया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार फिलिस्तीन का मुद्दा उठाया।
शिया-सुन्नी एकता की मिसाल
हालांकि ईरान एक शिया बहुल राष्ट्र है और फिलिस्तीन में अधिकतर आबादी सुन्नी है, लेकिन गाजा संकट में खामेनेई का साहसिक समर्थन मुस्लिम एकता की मिसाल बन गया। अब उन्हें न केवल शिया बल्कि सुन्नी मुस्लिमों का भी समर्थन मिल रहा है।
“इस्लामिक दुनिया के हीरो”
इस पूरे घटनाक्रम ने खामेनेई को वैश्विक मुस्लिम जगत में नई पहचान दी है। जहां अधिकांश नेता खामोश रहे, वहां उन्होंने नेतृत्व किया — और अब उन्हें कई मुस्लिम देशों में एक आदर्श नेतृत्वकर्ता की तरह देखा जा रहा है।
“जब सब चुप थे, तब ईरान बोला — और यही ईरान को बड़ा बना गया।“
CHANNEL009 Connects India
