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“अगर वार से बचना है तो समझौता करो” — सऊदी अरब की ईरान को कड़ी चेतावनी

मध्य पूर्व में परमाणु तनाव फिर से गरमा गया है। इस बार सऊदी अरब खुलकर सामने आया है और तेहरान को सीधी चेतावनी दी है: “अगर अमेरिका से परमाणु समझौता नहीं हुआ, तो इजराइल हमला कर सकता है।”

तेहरान में सऊदी का विशेष मिशन

सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान हाल ही में ईरान की राजधानी पहुंचे और वहां के शीर्ष नेताओं से बातचीत की। सूत्रों के मुताबिक, सऊदी मंत्री ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, चीफ ऑफ स्टाफ मोहम्मद बाघेरी और विदेश मंत्री अब्बास अराकची से मुलाकात की और स्पष्ट रूप से कहा:

“समय बहुत कम है। अगर अमेरिका के साथ जल्द समझौता नहीं हुआ, तो इजराइल सैन्य कार्रवाई कर सकता है — और इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा।”


अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत, लेकिन असहमति बरकरार

डोनाल्ड ट्रंप की सरकार फिलहाल ईरान से परमाणु समझौते को लेकर बातचीत कर रही है। पांच दौर की वार्ता हो चुकी है, पर सबसे बड़ा विवाद यूरेनियम संवर्धन को लेकर है।

  • अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने संवर्धन कार्यक्रम पर रोक लगाए।

  • ईरान मानता है कि शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए इसे जारी रखना उसका अधिकार है।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, ईरान सीमित स्तर पर संवर्धन रोकने के लिए तैयार है, लेकिन अभी तक कोई ठोस सहमति सामने नहीं आई है।


इजराइल की धमकी: “बातचीत नहीं तो हमला”

इजराइल इस मुद्दे पर सबसे अधिक सतर्क और आक्रामक रुख अपनाए हुए है। उसका मानना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है और यदि कूटनीतिक हल नहीं निकला, तो वह खुद ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला कर सकता है।

इसी बढ़ते खतरे को भांपते हुए सऊदी अरब ने मध्यस्थता की पहल की — ताकि मध्य पूर्व एक और युद्ध की आग में न झुलसे।


ईरान का रुख: संवाद के लिए तैयार, लेकिन शंका बनी हुई है

ईरानी नेतृत्व ने वार्ता की संभावना से इनकार नहीं किया, लेकिन ट्रंप सरकार की “अस्थिर नीतियों” को लेकर विश्वास की कमी जताई। राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने कहा:

“हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अमेरिका की नीति में निरंतरता नहीं है। प्रतिबंधों से राहत चाहिए, मगर अपने परमाणु अधिकारों को हम पूरी तरह नहीं छोड़ सकते।”


मध्य पूर्व के लिए निर्णायक समय

अब सवाल ये है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होगा? क्या इजराइल संयम बरतेगा? और क्या सऊदी अरब का हस्तक्षेप किसी ठोस समाधान का रास्ता खोलेगा?

अगर कूटनीति असफल रही, तो पूरा क्षेत्र एक और सैन्य संकट की ओर बढ़ सकता है — और इस बार असर वैश्विक हो सकता है।

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