सिंगापुर: अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इंडो-पैसिफिक देशों को सख्त संदेश देते हुए कहा है कि चीन अब सिर्फ सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि ताइवान पर कब्जे की “वास्तविक रिहर्सल” कर रहा है। उन्होंने क्षेत्रीय देशों से रक्षा बजट में वृद्धि करने की अपील की और स्पष्ट किया कि चीन की आक्रामक रणनीति अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
🛡️ शांग्री-ला डायलॉग में अमेरिका का सख्त रुख
हेगसेथ ने सिंगापुर में आयोजित शांग्री-ला डायलॉग में कहा,
“अब समय आ गया है कि हम हकीकत को स्वीकार करें — चीन का खतरा वास्तविक है, और यह कभी भी सामने आ सकता है।”
उन्होंने बताया कि बीजिंग की योजना 2027 तक ताइवान पर सैन्य नियंत्रण की क्षमता विकसित करने की है। वहीं, दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों पर सैन्य ठिकानों की स्थापना और हाइपरसोनिक हथियारों व अंतरिक्ष तकनीक में चीन की प्रगति को उन्होंने एक बड़ा खतरा बताया।
🌐 चीन की वैश्विक गतिविधियों पर भी नजर
हेगसेथ ने चीन की लैटिन अमेरिका में गहरी पैठ, खासकर पनामा नहर के पास उसके प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बीजिंग अब क्षेत्रीय नहीं, वैश्विक स्थिरता को चुनौती दे रहा है।
इसके जवाब में अमेरिका ‘गोल्डन डोम’ नामक अंतरिक्ष-आधारित मिसाइल रक्षा प्रणाली विकसित कर रहा है, जो आने वाले वर्षों में चीन की सैन्य शक्ति को संतुलित करने में मदद करेगी।
💬 चीन ने क्या प्रतिक्रिया दी?
चीन की ओर से इस सम्मेलन में कोई शीर्ष रक्षा अधिकारी नहीं आया। उन्होंने केवल एक निम्न-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजा, जिस पर हेगसेथ ने तंज कसते हुए कहा,
“हम यहां मौजूद हैं, लेकिन कुछ और देश गायब हैं।”
चीन के रियर एडमिरल हू गांगफेंग ने अमेरिका के आरोपों को “झूठा और भड़काऊ” बताया लेकिन कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने कहा कि ऐसे बयान क्षेत्रीय शांति को खतरे में डालते हैं।
❓ रक्षा संसाधनों की ट्रांसफर पर उठे सवाल
यूक्रेन और गाजा में चल रहे संघर्ष के चलते अमेरिका ने कुछ महत्वपूर्ण सैन्य संसाधन इंडो-पैसिफिक से हटाकर यूरोप और मध्य पूर्व भेजे हैं। उदाहरण के तौर पर, यमन से हूती हमलों का जवाब देने के लिए एक पैट्रियट मिसाइल डिफेंस यूनिट को वहां भेजा गया, जिसकी तैनाती में 73 सैन्य कार्गो विमानों का इस्तेमाल हुआ।
जब हेगसेथ से इस फैसले पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधा उत्तर नहीं दिया, लेकिन कहा कि ये निर्णय वैश्विक सुरक्षा प्राथमिकताओं के तहत लिए गए हैं।
⚖️ इंडो-पैसिफिक देशों की दुविधा
इंडो-पैसिफिक के कई देश चीन के साथ आर्थिक साझेदारी के चलते खुलकर विरोध नहीं कर पाते, लेकिन बीजिंग की दबंगई, जैसे समुद्री संसाधनों पर दावा, उन्हें परेशान कर रही है। हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका बिना किसी वैचारिक शर्त के सहयोग करेगा — चाहे कोई देश पश्चिमी नीतियों को अपनाता हो या नहीं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका सांस्कृतिक समानता के आधार पर नहीं, बल्कि संप्रभुता और सुरक्षा की साझेदारी पर भरोसा करता है।
🔍 निष्कर्ष
अमेरिका ने संकेत दे दिया है कि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा, और चीन की किसी भी सैन्य या रणनीतिक बढ़त को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि, ताइवान संकट को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन दोनों देशों के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा अब खुलकर सामने आ चुकी है।
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