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अर्जेंटीना से वेटिकन तक: जॉर्ज बर्गोग्लियो कैसे बने पोप फ्रांसिस

pope francis

कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप फ्रांसिस का 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे पोप फ्रांसिस ने वेटिकन सिटी में अंतिम सांस ली। उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि वेटिकन प्रशासन द्वारा की गई।

एक विनम्र शुरुआत

17 दिसंबर 1936 को अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में जन्मे पोप फ्रांसिस का असली नाम था जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो। उनके माता-पिता इटली से प्रवास कर अर्जेंटीना आए थे। पिता रेलवे में अकाउंटेंट थे और मां एक गृहिणी थीं। जॉर्ज का शुरुआती जीवन आम मध्यमवर्गीय परिवार की तरह बीता।

वैज्ञानिक पढ़ाई से प्रीस्ट बनने का सफर

जॉर्ज ने अपनी शिक्षा केमिकल टेक्नोलॉजी में पूरी की, लेकिन जीवन की राह कुछ और थी। उन्होंने ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ नामक धार्मिक संगठन में शामिल होकर आध्यात्मिक जीवन को अपनाया। इसके बाद उन्होंने मानविकी, दर्शन और धर्मशास्त्र की पढ़ाई की और शिक्षा क्षेत्र में भी काम किया।

चर्च के शीर्ष तक का सफर

1969 में उन्हें औपचारिक रूप से पुजारी नियुक्त किया गया। इसके बाद उनकी काबिलियत और निष्ठा के चलते 1992 में उन्हें बिशप और 1998 में ब्यूनस आयर्स का आर्कबिशप बनाया गया। 2001 में वे कार्डिनल बने — जो कि चर्च की एक प्रमुख रैंकिंग है।

पोप बनने की कहानी

2013 में जब तत्कालीन पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया, तब वेटिकन में नया पोप चुनने के लिए सम्मेलन हुआ। 13 मार्च 2013 को कार्डिनल्स के वोटों से जॉर्ज बर्गोग्लियो को पोप चुना गया। उन्होंने सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी के सम्मान में खुद को पोप फ्रांसिस नाम दिया — वे अमेरिका महाद्वीप से चुने जाने वाले पहले पोप बने।

विचारधारा: उदार या पारंपरिक?

पोप फ्रांसिस के विचार कई बार उदार माने गए, जैसे उन्होंने LGBTQ समुदाय के प्रति सहानुभूति दिखाई और पूंजीवादी नीतियों पर सवाल उठाए। हालांकि, उन्होंने चर्च के पारंपरिक सिद्धांतों पर कभी सीधा प्रहार नहीं किया — महिला प्रीस्ट, समलैंगिक विवाह और गर्भपात पर वे चर्च की पुरानी नीतियों के समर्थक रहे।

विरासत

अपने कार्यकाल के दौरान पोप फ्रांसिस ने चर्च के अंदर पारदर्शिता, यौन शोषण के मामलों पर कार्रवाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को प्राथमिकता दी। उन्होंने “चाइल्ड एब्यूज” को चर्च के इतिहास पर सबसे बड़ा कलंक बताया और इसके खिलाफ कड़े कदम उठाए।

अब उनके निधन के बाद वेटिकन में कॉन्क्लेव प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें नए पोप का चुनाव किया जाएगा।

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