📍 22 जून 2025 | रिपोर्ट – वैश्विक राजनीति विश्लेषण
ईरान, अमेरिका और इसराइल के बीच तेजी से बढ़ते टकराव ने वैश्विक स्तर पर राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक अस्थिरता को जन्म दे दिया है। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापारिक मार्गों और भू-राजनीतिक संतुलन पर इसका असर अब स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
13 जून को इसराइल द्वारा शुरू किए गए “ऑपरेशन राइज़िंग लायन” और फिर अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर की गई सैन्य कार्रवाई ने विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय खड़ा कर दिया है। अब सवाल यह है कि भारत, अरब देश और वैश्विक शक्तियाँ इस स्थिति में कैसा रुख़ अपनाएंगी?
भारत की कूटनीतिक चुनौती: इसराइल और ईरान के बीच संतुलन
भारत के लिए यह संघर्ष एक कूटनीतिक दुविधा लेकर आया है। इसराइल भारत का भरोसेमंद रक्षा सहयोगी है, वहीं ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक, रणनीतिक और ऊर्जा-आधारित संबंध हैं।
भारत चाबहार बंदरगाह से लेकर मध्य एशिया तक ईरान के साथ कई परियोजनाओं में शामिल है, जबकि इसराइल से उसे अत्याधुनिक हथियार प्रणाली, रक्षा तकनीक और खुफिया सहयोग मिलता है।
ग्रेटर वेस्ट एशिया फ़ोरम की चेयरपर्सन डॉ. मीना रॉय के अनुसार, “भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि वो किसी एक पक्ष के साथ जाते हुए अपने दीर्घकालिक हितों को नुकसान न पहुँचाए।”
उन्होंने ज़ोर दिया कि भारत के लिए खाड़ी देशों के साथ संबंध, तेल आयात, और वहाँ बसे करोड़ों प्रवासी भारतीय प्राथमिकता में हैं। युद्ध की स्थिति इन सभी को प्रभावित कर सकती है।
अरब देशों का रुख़: संयम, शांति और रणनीतिक दूरी
मध्य-पूर्व के प्रभावशाली इस्लामिक देशों, विशेषकर सऊदी अरब, क़तर और ओमान ने इसराइल के हमलों की तीव्र आलोचना की है। क़तर ने इसे “अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए गंभीर ख़तरा” बताया है और सऊदी अरब ने इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करार दिया।
डॉ. रॉय का मानना है कि अरब देश संघर्ष बढ़ता नहीं देखना चाहते। “वे नहीं चाहेंगे कि अमेरिका की सक्रिय भागीदारी से यह लड़ाई और फैल जाए। अरब जगत अब युद्ध से ज़्यादा स्थायित्व और राजनीतिक संतुलन में रुचि लेता है।”
यह बदलाव संकेत करता है कि हाल के वर्षों में ईरान के प्रति सामरिक दृष्टिकोण में भी कुछ बदलाव आया है, भले ही वह सीमित और सतर्क ही क्यों न हो।
इसराइल में आंतरिक समर्थन और नेतन्याहू की वापसी
ग़ज़ा संघर्ष के दौरान आलोचना झेलने वाले इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अब ईरान के विरुद्ध अभियान के चलते फिर लोकप्रिय हो रहे हैं। सर्वेक्षणों में संकेत हैं कि उनकी पार्टी लिकुड की स्थिति बेहतर हुई है।
यरूशलम से वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर मिश्रा के अनुसार, “ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकना इसराइलियों के लिए अस्तित्व का मुद्दा बन चुका है। चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—इस मामले में आम सहमति है।”
अमेरिका की रणनीति और ट्रंप की राजनीतिक दुविधा
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही ‘शांति’ के वादे के साथ व्हाइट हाउस वापसी की थी, लेकिन अब उन्होंने खुद को एक जटिल भू-राजनीतिक युद्ध में झोंक दिया है।
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के उपनिदेशक कबीर तनेजा के मुताबिक, अमेरिका की नीति इसराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अमेरिका ही एकमात्र देश है जिसके पास इतने शक्तिशाली बम हैं जो ईरान की गहराई में स्थित न्यूक्लियर साइट्स को भेद सकते हैं।
ट्रंप के आलोचकों का कहना है कि अगर अमेरिका इस युद्ध में और गहराई से शामिल होता है, तो ट्रंप की “ग़ैर-हस्तक्षेपवादी” छवि को गहरा नुकसान हो सकता है।
रूस और चीन का रवैया: राजनयिक समर्थन, लेकिन सीमित
इस संघर्ष में चीन और रूस की भूमिका संतुलित लेकिन रणनीतिक है। चीन ने इसराइल के हमलों को रेड लाइन क्रॉस करार दिया, जबकि रूस ने अब तक सैन्य हस्तक्षेप से परहेज़ किया है।
कबीर तनेजा कहते हैं, “रूस और चीन दोनों ईरान को राजनीतिक समर्थन देंगे लेकिन वे उसके लिए युद्ध नहीं लड़ेंगे। हालांकि, अमेरिका को इस क्षेत्र में उलझा देखना उनके लिए सामरिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।”
क्या भारत को रुख़ स्पष्ट करना होगा?
भारत अब तक इस संघर्ष पर संयमित प्रतिक्रिया देता आया है, लेकिन अगर हालात बिगड़ते हैं, तो उसे अपने हितों को देखते हुए किसी एक पक्ष की ओर झुकना पड़ सकता है।
डॉ. मीना रॉय ने स्पष्ट किया, “अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अंतिम निर्णय राष्ट्रीय हितों के आधार पर लिया जाता है। अगर कभी ऐसा समय आया कि भारत को किसी एक पक्ष का समर्थन करना हो, तो वह तय करेगा कि कौन-सा रिश्ता अधिक अहम है।”
निष्कर्ष: दुनिया एक नई उथल-पुथल की कगार पर
ईरान-अमेरिका-इसराइल संघर्ष न केवल परमाणु हथियारों के खतरे को उभार रहा है, बल्कि इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार, भारतीय विदेश नीति और इस्लामिक देशों की एकजुटता पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह संतुलन साधने का समय है—जहां शांति की वकालत करते हुए उन्हें रणनीतिक चुप्पी और चतुर सक्रियता दोनों बनाए रखनी होंगी।
CHANNEL009 Connects India
