📅 22 जून 2025 | रिपोर्ट: अंतरराष्ट्रीय डेस्क
ट्रंप की “शांति” से “सर्जिकल स्ट्राइक” तक की यात्रा
जनवरी 2025 में दूसरी बार राष्ट्रपति पद संभालने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को एक शांति-प्रेमी नेता के तौर पर पेश किया था। उन्होंने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि उनका प्रशासन दुनिया को स्थिरता की ओर ले जाएगा, विशेष रूप से मध्य पूर्व में। मगर अब, कुछ ही महीनों बाद, वही ट्रंप अमेरिका को एक नए संभावित युद्ध की तरफ ले जाते दिखाई दे रहे हैं।
बीते शनिवार को अमेरिका ने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों—फ़ोर्दो, नतांज़ और इस्फ़हान—पर हमले किए। यह निर्णय ट्रंप द्वारा घोषित “शांति मिशन” की कल्पना से बिल्कुल उलट प्रतीत होता है।
व्हाइट हाउस से कड़े संदेश: चेतावनी और आत्मविश्वास
हमले के कुछ ही घंटे बाद ट्रंप ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ के साथ व्हाइट हाउस से राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने इस ऑपरेशन को “शानदार सफलता” बताया और कहा कि ईरान को अब पीछे हटना होगा।
“अगर ईरान परमाणु कार्यक्रम से पीछे नहीं हटा, तो अगली कार्रवाई पहले से ज़्यादा भयानक और आसान होगी,” ट्रंप ने चेतावनी दी।
उन्होंने यह भी कहा कि कई ठिकानों पर अब भी हमले किए जाने बाकी हैं।
‘दो हफ्ते’ की डेडलाइन जो सिर्फ दो दिन चली
ट्रंप ने कुछ दिन पहले ही ईरान को दो सप्ताह की चेतावनी दी थी, लेकिन हमले सिर्फ दो दिन बाद हो गए। सवाल यह है: क्या यह चेतावनी सिर्फ रणनीतिक भ्रम पैदा करने का तरीका थी? या फिर पर्दे के पीछे चल रही कूटनीतिक कोशिशें नाकाम हो गईं?
यह स्पष्ट नहीं है कि क्या ट्रंप ने हमला करने का फैसला पहले ही कर लिया था और डेडलाइन केवल रणनीतिक शोरगुल थी, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि अब अमेरिका खुद को एक सैन्य संघर्ष में उलझा हुआ पा सकता है।
क्या ईरान इस हमले को नजरअंदाज़ करेगा?
ईरान की तरफ से अब तक यही कहा गया है कि ठिकानों से संवेदनशील सामग्री पहले ही हटा ली गई थी और नुकसान मामूली रहा। मगर, यह दावा कितना सच है, इसका पता आने वाले दिनों में लगेगा।
अगर अमेरिका वाकई ईरान की सुरक्षित परमाणु संरचनाओं को पूरी तरह नष्ट करने में विफल रहा है, तो दोबारा हमला करने का दबाव बढ़ेगा। इससे ट्रंप को सिर्फ एक सैन्य प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक जोखिम भी उठाना होगा।
अमेरिकी राजनीति में अंदरूनी चुनौती
ट्रंप का यह निर्णय केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी विवादास्पद है। डेमोक्रेटिक पार्टी पहले ही इसकी आलोचना कर रही है, लेकिन ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी दरारें दिखाई देने लगी हैं।
‘अमेरिका फर्स्ट’ सोच वाले नेताओं ने इस हमले को ट्रंप के गैर-हस्तक्षेपवादी वादे के खिलाफ बताया है। ट्रंप का अपने तीन करीबी सलाहकारों के साथ सार्वजनिक रूप से खड़ा होना इस संकट के बीच पार्टी की एकता दिखाने का प्रयास हो सकता है।
क्या ट्रंप की रणनीति उल्टा असर करेगी?
ट्रंप की रणनीति स्पष्ट है—ईरान को सैन्य दबाव में लाकर कूटनीतिक रियायतें लेना। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह काम करेगा?
जो देश इज़राइल के सैन्य हमलों के बाद भी बातचीत के लिए तैयार नहीं हुआ, क्या वह अमेरिका की बमबारी के बाद झुक जाएगा?
ट्रंप के समर्थकों के लिए यह दिखाना ज़रूरी हो गया है कि यह एक सटीक और अंतिम वार था। लेकिन अगर ईरान ने पलटवार किया या फिर अमेरिकी ठिकानों पर हमला हुआ, तो स्थिति अमेरिका के नियंत्रण से बाहर जा सकती है।
संयुक्त राष्ट्र की चिंता: क्या यह अराजकता की शुरुआत है?
यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि यह टकराव अगर बढ़ता है, तो पूरे क्षेत्र में अराजकता फैल सकती है। मध्य पूर्व पहले से ही अस्थिर है और यह हमला उस अस्थिरता को गहराई दे सकता है।
निष्कर्ष: शांति-दूत या युद्ध का अगुआ?
डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने खुद को एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में पेश किया था जो “नए युद्ध नहीं करेगा”, अब एक बड़ी लड़ाई की दिशा में अमेरिका का नेतृत्व कर रहे हैं। यह लड़ाई अभी थमी नहीं है, और अगर ईरान ने जवाबी हमला किया, तो यह टकराव एक और इराक या अफगानिस्तान में बदल सकता है।
ट्रंप ने अपनी चाल चल दी है, लेकिन अब उसके परिणाम केवल उनके हाथ में नहीं हैं।
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