मध्य पूर्व एक बार फिर धधक रहा है। ईरान और इजराइल के बीच छिड़ी लड़ाई ने क्षेत्रीय संतुलन को हिला दिया है। ईरान ने हाल ही में इजराइल पर सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें दागी, जिसे उसने “सीवियर पनिशमेंट” नाम दिया।
हालांकि ये टकराव तेहरान और तेल अवीव के बीच है, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की चिंता भी गहराने लगी है।
शहबाज शरीफ ने बयान में कहा कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव पर उन्हें गंभीर चिंता है और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से शांति बहाल करने की अपील की है। लेकिन ये चिंता केवल बयान भर नहीं, बल्कि उसके पीछे तीन ठोस कारण हैं जो सीधे पाकिस्तान के हितों से जुड़ते हैं।
1. ईरान में फंसे हैं हजारों पाकिस्तानी जायरीन
वर्तमान संकट के समय पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता है – अपने नागरिकों की सुरक्षा।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, करीब 5,000 पाकिस्तानी जायरीन इस समय ईरान में मौजूद हैं।
इनमें से कई तीर्थयात्री ईरान में पाकिस्तानी दूतावास से संपर्क नहीं करते, जिससे संकट की स्थिति में उनकी निगरानी और सुरक्षा चुनौती बन जाती है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि इन नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जाए।
विदेश मंत्री इशाक डार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए तेहरान स्थित दूतावास में एक 24/7 क्राइसिस मैनेजमेंट यूनिट की स्थापना का आदेश दिया है।
इसके साथ ही एक हॉटलाइन नंबर भी जारी किया गया है: +98 21 6694 1388।
2. ईरान में हो सकता है निवेश का नुकसान
पाकिस्तान और ईरान ने हाल ही में द्विपक्षीय व्यापार को 10 बिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य तय किया है।
बीते वर्ष दोनों देशों के बीच व्यापार 2.8 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। इस बढ़ते आर्थिक सहयोग को देखते हुए ईरान के साथ रिश्ते पाकिस्तान के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
अब जब ईरान युद्ध में उलझा है, और इजराइल-अमेरिका इसके खिलाफ सक्रिय हैं, तो ईरान में पाकिस्तान का संभावित निवेश और व्यापारिक गतिविधियां खतरे में पड़ सकती हैं।
इस संकट के समय में ईरान-पाकिस्तान व्यापार समझौता आर्थिक रूप से एक जोखिम भरा दांव बनता दिख रहा है, खासकर तब जब पाकिस्तान पहले से ही IMF के दबाव में आर्थिक सुधार की कठिन राह पर है।
3. ईरान का साथ दें या नहीं? मुश्किल में शहबाज सरकार
ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर यह रिश्ता ‘गले की हड्डी’ बनता जा रहा है।
अगर पाकिस्तान ईरान का खुलकर समर्थन करता है, तो अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते बिगड़ सकते हैं।
वहीं अगर ईरान से दूरी बनाए रखता है, तो सीमा पार सुरक्षा चुनौतियाँ और क्षेत्रीय अस्थिरता पाकिस्तान को झेलनी पड़ सकती है।
इस दुविधा में फंसे शहबाज शरीफ को बिना कोई पक्ष लिए रणनीतिक संतुलन बनाए रखना बेहद मुश्किल हो रहा है।
निष्कर्ष: मुश्किलें और गहराएंगी?
ईरान और इजराइल की यह लड़ाई भले ही दो देशों के बीच की हो, लेकिन पाकिस्तान को भी इसका सियासी और आर्थिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
चाहे नागरिकों की सुरक्षा हो, निवेश की अनिश्चितता या वैश्विक कूटनीति में फंसी स्थिति — शहबाज शरीफ की सरकार एक नाजुक संतुलन साधने की कोशिश में है।
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