20 जून 2025 | विशेष रिपोर्ट
ईरान और इसराइल के बीच छिड़े युद्ध का सीधा असर अब वहां रह रहे भारतीय नागरिकों पर भी साफ़ दिखाई देने लगा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए व्यापारी, छात्र और श्रमिक जान बचाने के लिए बंकरों, मेट्रो स्टेशनों और सुरक्षित इलाकों में छिपने को मजबूर हैं। कई भारतीयों को स्थानीय निवासियों और कुछ मामलों में भारतीय दूतावास की मदद से खतरे से बाहर निकाला गया है।
तेहरान से यज़्द की ओर: धुएं से भरी एक यात्रा

हफ़सल ई. मुल्लन, 38 वर्षीय व्यवसायी, केरल के मलप्पुरम ज़िले से हैं। वह अपने सहयोगी मोहम्मद थेन्गाकूडान के साथ ईरान के एक औद्योगिक संयंत्र का निरीक्षण करने पहुंचे थे। यह उनकी तेहरान की तीसरी यात्रा थी — लेकिन पहली बार वे खुद को युद्ध के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहे थे।
हफ़सल बताते हैं:
“तेहरान में मिसाइल हमलों के बाद जब हमारा होटल असुरक्षित हो गया, तो हम मेट्रो स्टेशन में शरण लेने गए। लेकिन उसके पहले भारतीय दूतावास पहुंचे — जो बंद मिला। परिवार के एक स्थानीय मित्र ने हमें सुरक्षित यज़्द तक पहुंचाया। 10 घंटे का रास्ता था, दोनों ओर से धुआं उठ रहा था।”
अब वे यज़्द के एक सुरक्षित ठिकाने पर हैं, जहां स्थानीय लोग खुद एसी के बिना रहकर उन्हें सुविधा दे रहे हैं। हालांकि, उन्हें अभी भी यह नहीं पता कि वे भारत कैसे लौटेंगे, क्योंकि दूतावास की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिले हैं।
कर्नाटक और कश्मीर के छात्रों की दहशत
तेहरान के एक हॉस्टल के पास हुए विस्फोट में 60 लोगों वाला एक घर पूरी तरह तबाह हो गया, जिसमें 25 से अधिक मौतें हुईं। यह हॉस्टल उन भारतीय छात्रों का पड़ोसी था जो धार्मिक और मेडिकल शिक्षा के लिए तेहरान में रह रहे थे।
सैयद मोहम्मद तकी के पिता ने बताया:
“हमारे बच्चे जितने डरे हुए थे, हम भी उतने ही। धमाके के तुरंत बाद भारतीय दूतावास ने स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर सभी छात्रों को तेहरान से निकालकर क़ोम भेजा, जो लगभग 200 किमी दूर है।”
मेडिकल छात्रा फ़रीहा मेहदी की मां ने बताया कि छात्रों को अब आर्मीनिया ले जाया जा रहा है, जहां से उन्हें भारत वापस लाने की योजना बनाई जा रही है।
तेल अवीव में तनाव, लेकिन नियंत्रित हालात
ईरान की तुलना में इसराइल में भारतीय श्रमिकों की स्थिति कुछ बेहतर है। विशेष रूप से बुज़ुर्गों की देखभाल करने वाले केयरगिवर्स के लिए स्थिति स्थिर बनी हुई है।
बीजू पुल्लन, एक भारतीय केयरगिवर, कहते हैं:
“तेल अवीव में खतरे के समय सायरन बजता है, लोग बंकर में चले जाते हैं। लेकिन अब ये रूटीन हो गया है। हम घर में ही रहते हैं और बंकर में जाना छोड़ दिया है।”
बीजू की बातों से स्पष्ट है कि हालांकि वहां सुरक्षा को लेकर सजगता है, पर स्थानीय जनजीवन पूरी तरह ठप नहीं पड़ा है।
दूतावास की भूमिका पर सवाल
कुछ मामलों में भारतीय दूतावास की तुरंत प्रतिक्रिया से छात्रों को राहत मिली, लेकिन हफ़सल जैसे कई लोगों ने संवाद की कमी और स्पष्ट मार्गदर्शन के अभाव को लेकर निराशा ज़ाहिर की।
“दूतावास ने कहा कि सोशल मीडिया से अपडेट लें, लेकिन इंटरनेट काम नहीं कर रहा था। हमसे कहा गया कि हम वहीं रहें जहां हैं — लेकिन जब गोलियां चल रही हों, तो वहां रहना कैसे संभव है?” — हफ़सल
निष्कर्ष: ज़रूरत है ठोस निकासी नीति की
ईरान में फंसे भारतीयों के अनुभव यह बताते हैं कि युद्ध जैसे हालात में केवल एक स्ट्रेटेजिक निकासी योजना ही जान बचा सकती है। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो, तो स्थानीय लोगों की मदद या निजी निर्णयों पर निर्भर रहना हमेशा सुरक्षित नहीं होता।
अब ज़रूरत इस बात की है कि:
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भारत सरकार युद्ध क्षेत्रों में फंसे नागरिकों के लिए तेज़ और पारदर्शी ऑपरेशन चलाए,
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और लोगों को भरोसा दिया जाए कि संकट के समय उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।
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