रियाद/तेहरान/वॉशिंगटन – पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच सऊदी अरब की विदेश नीति को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी के बाद सऊदी का रुख ऐसा रहा, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि वह किस पाले में खड़ा है।
21 जून को अमेरिका द्वारा ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद जहां सऊदी ने “गंभीर चिंता” जताकर कूटनीतिक दूरी बनाए रखी, वहीं 23 जून को जब ईरान ने जवाबी हमला करते हुए कतर स्थित अमेरिकी एयरबेस अल-उदीद पर मिसाइलें दागीं, तब सऊदी ने सख्त और तीखा बयान जारी कर ईरान की आलोचना कर दी।
ईरान को घेरा, अमेरिका पर चुप्पी
अमेरिका द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई को लेकर सऊदी ने भले ही “संतुलित” भाषा का प्रयोग किया, लेकिन जैसे ही ईरान ने पलटवार करते हुए कतर में अमेरिकी बेस को निशाना बनाया, रियाद ने सीधे अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की बात कही।
सऊदी विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में ईरान के हमले को “गैर-जिम्मेदाराना और अस्वीकार्य” बताया। उन्होंने इसे क्षेत्रीय शांति और पड़ोसी देशों की संप्रभुता पर हमला करार दिया।
कतर भी आया सख्त तेवर में
कतर, जो अब तक इस पूरे संघर्ष में तुलनात्मक रूप से संयमित रहा था, ने भी इस हमले के बाद नाराज़गी जताई। कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजेद अल-अंसारी ने साफ कहा कि ईरान ने कतर की वायुसीमा और संप्रभुता का उल्लंघन किया है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कतर अपने सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए जवाब देने का अधिकार रखता है।
हालांकि कतर की वायु सुरक्षा प्रणाली ने ईरानी मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर हमले को विफल कर दिया।
ईरान ने दी सफाई, रिश्तों की बात दोहराई
ईरान की ओर से सफाई दी गई कि हमला आवासीय इलाकों से दूर किया गया था और इसका उद्देश्य कतर को नुकसान पहुंचाना नहीं था। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने कहा कि तेहरान अपने “भाईचारे वाले” संबंधों को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और यह हमला अमेरिकी उपस्थिति के खिलाफ था, न कि कतर के खिलाफ।
सऊदी की रणनीति: संतुलन नहीं, झुकाव साफ
गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिका द्वारा की गई शुरुआती बमबारी, जिसने इस पूरे घटनाक्रम को गति दी, उस पर सऊदी ने अत्यंत नपा-तुला बयान दिया था। न तो अमेरिका के कदम को आलोचना मिली, न ही किसी तरह की सार्वजनिक आपत्ति। लेकिन जब ईरान ने जवाबी हमला किया, तब सऊदी तीखे शब्दों में सामने आया।
यह रुख यह बताता है कि सऊदी अरब अब भी अमेरिका के साथ अपने रक्षा और कूटनीतिक संबंधों को प्राथमिकता देता है, भले ही क्षेत्रीय संवेदनशीलता क्यों न हो।
निष्कर्ष: सऊदी की चुप्पी बहुत कुछ कह गई
विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी की यह प्रतिक्रिया बताती है कि वह अमेरिका के साथ टकराव मोल नहीं लेना चाहता, खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्र में बड़ी सामरिक उठा-पटक चल रही है। ईरान पर सीधा हमला बोलकर और अमेरिका पर चुप रहकर सऊदी ने यह भी संकेत दे दिया है कि वह कूटनीति में किसके साथ खड़ा है — भले ही ज़ुबान से न कहे।
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