इज़राइल द्वारा ईरान के भीतर कई ठिकानों—विशेषकर परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रतिष्ठानों—पर किए गए हमलों के बाद क्षेत्र में हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। दोनों देशों की ओर से सैन्य कार्रवाइयों का सिलसिला अब जारी है, और इसकी सबसे बड़ी मार आम नागरिकों पर पड़ रही है।
पुरानी यादें, नई चिंता
तेहरान में रहने वाली कुछ वरिष्ठ महिलाएं कहती हैं कि मौजूदा स्थिति ने उन्हें 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध की याद दिला दी है। उस समय के मुकाबले आज की स्थिति कहीं अधिक भयावह लगती है क्योंकि अब कोई चेतावनी या सायरन नहीं बजता। लोग कहते हैं, “पहले हमले से पहले सायरन सुनाई देता था, अब मौत अचानक आ जाती है।”
नई पीढ़ी की पहली जंग
जो लोग युद्ध के बाद पैदा हुए, उनके लिए यह अनुभव बिल्कुल नया और भयावह है। पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें, इंटरनेट का अस्थिर होना और अफवाहों का तेज़ी से फैलना—यह सब मिलकर एक दहशत का माहौल बना रहा है। लोग राजधानी छोड़ने की सोच रहे हैं लेकिन कईयों के लिए यह संभव नहीं है।
एक नागरिक ने बताया, “मेरे बुज़ुर्ग माता-पिता यात्रा नहीं कर सकते, और मेरी नौकरी भी यहीं है। मेरे पास कोई विकल्प नहीं है।” वहीं कुछ लोग सैन्य ठिकानों से दूरी बनाना चाहते हैं, लेकिन असल चिंता यह है कि उन्हें यह भी नहीं पता कि वे ठिकाने कहां स्थित हैं।
सरकार पर अविश्वास और निराशा
कई नागरिकों का मानना है कि ईरानी नेतृत्व आम लोगों की सुरक्षा को लेकर लापरवाह है। हमलों के कई घंटे बाद तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट बयान नहीं आया। जब जानकारी दी गई, तब तक लोग सोशल मीडिया और अफवाहों पर ही निर्भर थे।
सरकार की सबसे बड़ी आलोचना एयर डिफेंस सिस्टम की विफलता को लेकर हो रही है। लोग सवाल कर रहे हैं कि कैसे इज़राइली विमान राजधानी तेहरान समेत अन्य शहरों तक बिना रुकावट पहुंच गए?
सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया और रणनीति
हमलों के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने एक वीडियो संदेश में ‘दुश्मन को घुटनों पर लाने’ की बात कही। इसके तुरंत बाद ईरानी मिसाइलें इज़राइल के शहरों पर दागी गईं, जिनकी तस्वीरें और वीडियो सरकारी मीडिया पर लगातार चलाए जा रहे हैं।
सरकारी चैनल अब ‘बदले’ और ‘साहसिक प्रतिक्रिया’ की बात कर रहे हैं। हालांकि, ज़मीनी सच्चाई यह है कि इज़राइल अब भी ईरान के कई अहम प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहा है, और तेहरान के आसमान में ड्रोन देखे जा रहे हैं।
अंदरूनी हालात और दहशत
तेहरान की सड़कों पर डर साफ देखा जा सकता है। पेट्रोल भरवाने को लेकर होड़, जरूरी सामान का संग्रह और शहर से भागने की योजना—लोगों के व्यवहार में यह स्पष्ट है कि वे खुद को संकट में महसूस कर रहे हैं।
शुक्रवार शाम गृहमंत्री ने सार्वजनिक बयान जारी कर जनता से शांति बनाए रखने और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की, लेकिन यह प्रयास भी भय के माहौल को पूरी तरह शांत नहीं कर पाया।
मीडिया का स्वर और प्रतिशोध की मांग
सरकारी एजेंसियों ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के वरिष्ठ सदस्यों और वैज्ञानिकों की मौत की पुष्टि की है, लेकिन हमलों के प्रभाव और हताहतों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। इसके बजाय, धार्मिक संस्थानों और राजनीतिक संगठनों से ‘कड़े जवाब’ की मांग करने वाले बयान सामने आए हैं।
निष्कर्ष: एक राष्ट्र की बेचैनी
ईरान इस समय युद्ध की छाया में है—जहां न केवल हथियारों की गूंज सुनाई दे रही है, बल्कि आम लोगों के मन में असुरक्षा और सरकार पर अविश्वास भी गहराता जा रहा है। अतीत के अनुभवों और वर्तमान की नाकामी के बीच फंसे ईरानी नागरिक एक बार फिर वही सवाल पूछ रहे हैं—क्या हमारी सुरक्षा किसी की प्राथमिकता है?
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