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ऑपरेशन कगार पर छिड़ा अंतरराष्ट्रीय विवाद: भारत की कार्रवाई पर बांग्लादेश में आलोचना की लहर

नई दिल्ली/ढाका:
भारत के छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान ऑपरेशन कगार के तहत माओवादी नेटवर्क पर की गई निर्णायक कार्रवाई को लेकर भारत में जहां इसे सुरक्षा बलों की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने इसकी कड़ी आलोचना की है।

इस अभियान में CPI (माओवादी) के महासचिव केशवराव उर्फ बसवराज समेत करीब 27-28 माओवादी उग्रवादी ढेर किए गए थे।


बांग्लादेश से विरोध: मानवाधिकार की आड़ या वैचारिक सहानुभूति?

बांग्लादेश में स्थित एक पूर्ववर्ती संस्था, जिससे नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस पहले जुड़े रहे हैं, उसके 71 नागरिकों ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए इस अभियान को “राज्य प्रायोजित हिंसा” करार दिया।
उन्होंने दावा किया कि ऑपरेशन कगार के जरिए भारत सरकार जनजातीय और माओवादी विचारधारा के लोगों की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है।

बयान में कहा गया –

“21 मई को भारत सरकार ने ऑपरेशन कगार के नाम पर एक सैन्य कार्रवाई की, जिसमें माओवादी नेता बसवराज समेत 28 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या की गई। यह मुठभेड़ नहीं बल्कि सोची-समझी हत्या थी।”


भारत से ऑपरेशन कगार रोकने की मांग

इन बांग्लादेशी बुद्धिजीवियों ने भारत सरकार से अभियान बंद करने की अपील की है। इसके साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और प्रगतिशील आंदोलनों से आग्रह किया कि वे भारत के “उत्पीड़ित समुदायों और जनजातीय वर्गों” के साथ खड़े हों।


भारत में भी उठ रही आवाजें

सिर्फ बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि भारत में भी वामपंथी दल और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस अभियान पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि माओवादी आंदोलन को पूरी तरह से खात्मा करने के नाम पर, सरकार जनजातीय क्षेत्रों में सैन्य दमन को बढ़ावा दे रही है।


सरकार की दलील: माओवाद के खिलाफ निर्णायक मोर्चा

वहीं भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि यह अभियान आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी है और इससे उन क्षेत्रों में विकास और स्थिरता लाने का रास्ता साफ होगा, जो वर्षों से माओवादी हिंसा से पीड़ित हैं।


निष्कर्ष

ऑपरेशन कगार भले ही सुरक्षा और कानून व्यवस्था के नजरिए से एक सफल मिशन के तौर पर देखा जा रहा हो, लेकिन इससे जुड़े मानवाधिकार और राजनीतिक विमर्श ने इसे अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। भारत को अब इस संघर्ष में सुरक्षा, संवैधानिक अधिकार और वैश्विक धारणा के बीच संतुलन साधने की बड़ी चुनौती है।

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