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किसान उद्यमी का सपना और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी

गजेंद्र सिंह | लोक नीति विश्लेषक

भारत में आज भी करीब 45–50 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं और देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 18 प्रतिशत से ज्यादा है। किसान सिर्फ सरकारी योजनाओं के लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण विकास और सामाजिक संतुलन की रीढ़ हैं। केंद्रीय बजट 2026 में पहली बार किसान को एक उद्यमी (एंटरप्रेन्योर) के रूप में दिखाने की कोशिश नजर आती है, जो बाजार, निर्यात, तकनीक और वैल्यू चेन से जुड़ा हो।

पशुपालन और मत्स्य पालन पर जोर, लेकिन चिंता भी

ग्रामीण आय में पशुपालन का करीब 16 प्रतिशत योगदान है। बजट में पशु चिकित्सा कॉलेज, अस्पताल, लैब और प्रजनन केंद्रों के लिए पूंजी सब्सिडी की बात की गई है, जिससे पशु चिकित्सकों की कमी दूर करने और रोजगार बढ़ाने का लक्ष्य है।
इसी तरह मत्स्य पालन को आय बढ़ाने के साधन के रूप में देखा गया है। 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों के विकास, महिला समूहों और मछुआ एफपीओ को जोड़ने का प्रस्ताव है।
लेकिन सस्ते कर्ज, ऋण गारंटी और जोखिम साझा करने जैसी सुविधाओं की कमी से इन योजनाओं का असर जमीन पर सीमित रह सकता है।

उच्च-मूल्य कृषि की ओर झुकाव

बजट में नारियल, कोको, काजू, चंदन, अगरवुड और पहाड़ी क्षेत्रों में अखरोट-बादाम जैसी फसलों को बढ़ावा देने पर जोर है। इससे साफ है कि नीति अब सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं रहना चाहती।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक है और इससे करीब 3 करोड़ लोगों की आजीविका जुड़ी है। पुराने पेड़ों को बदलने और बेहतर किस्में लाने की योजना सकारात्मक है।
इंडियन काजू’ और ‘इंडियन कोको’ को 2030 तक वैश्विक ब्रांड बनाने का लक्ष्य दिखाता है कि कृषि नीति अब ब्रांडिंग और निर्यात पर भी ध्यान दे रही है।

लेकिन चिंता यह है कि उच्च-मूल्य कृषि को अनाज सुरक्षा, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और जोखिम सुरक्षा का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। संतुलन न होने पर इसका फायदा केवल बड़े किसानों तक सिमट सकता है।

तकनीक और एआई का इस्तेमाल

भारत-विस्टार जैसे एआई प्लेटफॉर्म के जरिए किसानों को उनकी भाषा में सलाह देने की योजना स्वागत योग्य है। लेकिन इसकी सफलता डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट और भरोसे पर निर्भर करेगी, जो आज भी कई ग्रामीण इलाकों में कमजोर है।

जो अहम बातें छूट गईं

  • मोटे अनाज, जैविक खेती और देसी बीजों पर पहले जो जोर था, वह इस बजट में लगभग गायब है।

  • मिट्टी की उर्वरता, जैविक खाद और जल संरक्षण के लिए कोई ठोस प्रोत्साहन नहीं दिखता।

  • सिंचाई विस्तार, नदियों को जोड़ने और इंडस वाटर ट्रीटी से जुड़े जल उपयोग पर भी स्पष्ट योजना नहीं है।

  • खाद, बीज जैसे कृषि इनपुट को टैक्स फ्री करने और देसी बीजों पर शोध को बढ़ावा देने के ठोस कदम नहीं हैं।

निष्कर्ष

यह बजट एक द्वंद्व दिखाता है। एक तरफ किसान को उद्यमी बनाने, उसे वैश्विक बाजार से जोड़ने की बात है। दूसरी तरफ पानी, मिट्टी, बीज, खाद, सस्ता कर्ज और जोखिम सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान कम है।
असल सवाल यह नहीं है कि भारत वैश्विक कृषि ब्रांड बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या छोटे किसान उस ब्रांड के भागीदार बनेंगे या सिर्फ कच्चा माल देने वाले रह जाएंगे। जब तक नीति में बाजार और सुरक्षा के बीच संतुलन नहीं होगा, तब तक किसान-केंद्रित विकास सिर्फ नारा ही बना रहेगा।

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