📍 वॉशिंगटन/तेहरान | 22 जून 2025
अमेरिका द्वारा ईरान के फ़ोर्दो, नतांज़ और इस्फ़हान स्थित परमाणु ठिकानों पर किए गए हवाई हमलों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में हलचल मच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम से तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आ सकता है, खासतौर पर जब एशिया के बाज़ार सोमवार सुबह खुलेंगे।
🛢️ क्यों बढ़ सकती हैं कीमतें?
क्रिस्टोल एनर्जी की सीईओ कैरोल नखले ने BBC से बातचीत में बताया:
“इन हमलों ने संघर्ष को एक नए और अधिक खतरनाक मोड़ पर ला दिया है। इससे बाज़ारों में अनिश्चितता बढ़ गई है, जो कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर की ओर धकेल सकती है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा:
“जब भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ता है, तो बाज़ार उसे ‘जियोपॉलिटिकल प्रीमियम’ के रूप में क़ीमतों में जोड़ता है। डर जितना बड़ा, प्रीमियम उतना ज़्यादा।”
📊 वर्तमान कीमतें और संभावित उछाल
हालांकि शुक्रवार को हफ्ते का कारोबार ब्रेंट क्रूड 77.01 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, लेकिन पिछले महीने इसमें लगभग 20% की वृद्धि देखी गई थी। इस घटनाक्रम के बाद, विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि सोमवार को यह कीमत 80 डॉलर या उससे ऊपर जा सकती है।
🧾 तेल की कीमतें क्यों मायने रखती हैं?
कच्चे तेल की कीमत सिर्फ पेट्रोल और डीज़ल तक सीमित नहीं है। इसका असर:
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ट्रांसपोर्ट लागत
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खाद्य आपूर्ति
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उद्योगों की उत्पादन लागत
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मुद्रास्फीति दर
जैसे कई अहम क्षेत्रों पर पड़ता है। यानी, अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो यह आम उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर डाल सकता है।
🌍 आगे क्या?
तेल उत्पादक देशों और ऊर्जा विशेषज्ञों की नजरें अब इस बात पर हैं कि ईरान इस हमले का जवाब किस रूप में देता है। अगर यह टकराव लंबा चलता है या खाड़ी क्षेत्र में तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो तेल की कीमतें तेज़ी से ऊपर जा सकती हैं।
📌 निष्कर्ष:
ईरान-अमेरिका-इसराइल संघर्ष की गंभीरता जितनी बढ़ेगी, तेल की क़ीमतें उतनी ही अस्थिर और ऊंची हो सकती हैं। इस समय डिप्लोमेसी और संयम ही वैश्विक बाज़ारों को स्थिर बनाए रखने का एकमात्र रास्ता है।
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