इज़राइल-गाजा संघर्ष के बीच वैश्विक स्तर पर एक बड़ा नागरिक आंदोलन आकार ले रहा है। 50 से अधिक देशों से लगभग 2,500 लोग ‘सुमुद काफिला’ (Sumud Convoy) के तहत गाजा पट्टी के राफा बॉर्डर की ओर कूच कर चुके हैं। इस काफिले का उद्देश्य इज़राइली ब्लॉकेड के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज कराना और फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता पहुंचाना है।
‘सुमुद’ क्या है?
अरबी शब्द ‘सुमुद’ का अर्थ है “दृढ़ता”। इसी भावना के साथ ट्यूनीशिया से यह विशाल काफिला 9 जून को रवाना हुआ है। इसमें 12 बसें और 100 से अधिक प्राइवेट वाहन शामिल हैं, जो ट्यूनिस से होकर लीबिया, फिर मिस्र और अंततः राफा बॉर्डर तक पहुंचने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
भारत से भी प्रतिनिधिमंडल शामिल
भारत से भी एक मानवाधिकार संगठनों का प्रतिनिधिमंडल इस मार्च में भाग ले रहा है। मुंबई निवासी और प्रतिनिधिमंडल की समन्वयक सना सैयद ने इसे “मानवता की दिशा में एक सामूहिक प्रयास” बताया है।
मिस्र से मिल सकती है चुनौती
12 जून को यह काफिला मिस्र की सीमा में दाखिल होने वाला था, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक मिस्र सरकार ने आधिकारिक प्रवेश की अनुमति नहीं दी है। हालांकि, मिस्र की राजधानी काहिरा तक पहले से पहुंचे कई अन्य देशों के एक्टिविस्ट वहां से मुख्य काफिले से जुड़ने की योजना बना रहे हैं।
पहले भी हुए प्रयास, अब है सबसे बड़ा मार्च
इज़राइल पहले भी गाजा पहुंचने की कोशिश कर रहे फ्रीडम फ्लोटिला जैसे कई प्रयासों को विफल कर चुका है। हाल ही में इज़राइली सुरक्षा बलों ने यूरोपीय सांसद रीमा हसन और पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग समेत 12 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर वापस भेज दिया था।
लक्ष्य गाजा पहुंचना नहीं, बल्कि दबाव बनाना है
हालांकि इस काफिले के राफा पहुंचने की संभावना सीमित है, फिर भी इसमें शामिल कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस वैश्विक एकजुटता से अंतरराष्ट्रीय समुदाय और नेताओं पर दबाव बनाया जा सकेगा कि वे इज़राइल पर युद्धविराम और मानवीय सहायता के लिए दबाव बढ़ाएं।
संगठनों का समर्थन
इस मुहिम को ट्यूनीशियाई जनरल लेबर यूनियन, नेशनल बार एसोसिएशन, लीग फॉर ह्यूमन राइट्स और इकोनॉमिक एंड सोशल राइट्स फोरम समेत कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का समर्थन प्राप्त है।
गाजा के लिए वैश्विक समर्थन क्यों जरूरी है?
गाजा में पिछले 20 महीनों से जारी संघर्ष और प्रतिबंधों ने लाखों नागरिकों की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है। इन हालात में वैश्विक नागरिक समाज की भागीदारी यह दिखाती है कि गाजा अब केवल एक भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक मानवाधिकार संकट बन चुका है।
निष्कर्ष:
‘सुमुद काफिला’ भले ही गाजा तक न पहुंच पाए, लेकिन यह प्रयास दुनिया भर के उन लोगों की आवाज़ बन चुका है जो न्याय, शांति और मानवीय गरिमा की बात करते हैं। यह काफिला उन लोगों की उम्मीद का प्रतीक है जो चुप नहीं बैठना चाहते।
CHANNEL009 Connects India
