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जनरल मुनीर के बयान पर उठे सवाल: पाकिस्तान के अंदर से उठी विरोध की आवाज़ें

pakistani sena pramukh

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल सैयद आसिम मुनीर ने हाल ही में इस्लामाबाद में आयोजित ओवरसीज़ पाकिस्तानी कन्वेंशन के दौरान अपने भाषण में एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच चले आ रहे ऐतिहासिक विवाद को हवा दी। इस चार दिवसीय कार्यक्रम में जनरल मुनीर ने टू नेशन थ्योरी का ज़िक्र किया, कश्मीर को पाकिस्तान की “शरीयनस” बताया और हिन्दू-मुसलमान के बीच भिन्नताओं को रेखांकित किया।

मुनीर ने कहा, “हम एक नहीं बल्कि दो अलग-अलग कौमें हैं। हमारे रीति-रिवाज, धर्म, सोच, परंपरा और मक़सद—सब कुछ अलग हैं। कोई भी ताकत कश्मीर को पाकिस्तान से अलग नहीं कर सकती।”

ये टिप्पणी ऐसे समय में आई जब हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर एक बार फिर बहस हुई थी। भारत के प्रतिनिधि पर्वतानेनी हरीश ने पाकिस्तान के दावों को खारिज करते हुए कहा था कि कश्मीर हमेशा भारत का हिस्सा था, है और रहेगा।

बलूचिस्तान में चल रहे विद्रोह पर बोलते हुए मुनीर ने कहा कि कुछ आतंकवादी पाकिस्तान के भविष्य को तय नहीं कर सकते, और पाकिस्तान इन चुनौतियों से जल्द ही निपटेगा।


पाकिस्तान के भीतर ही उठी आलोचनाएं

जनरल मुनीर के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच “फर्क” वाले बयान ने पाकिस्तान के अंदर ही कई बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की तीखी आलोचना झेली है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की बयानबाजी से देश में धार्मिक नफरत को बढ़ावा मिलेगा, खासतौर पर हिन्दू अल्पसंख्यकों के खिलाफ।

ताहा सिद्दीक़ी, जो निर्वासन में पेरिस में रहते हैं, ने मुनीर के बयान की निंदा करते हुए लिखा,
“सेना प्रमुख टू नेशन थ्योरी को हवा देकर बच्चों को झूठ सिखाने और ब्रेनवॉश करने का प्रयास कर रहे हैं। बांग्लादेश की आज़ादी के साथ ही यह थ्योरी खत्म हो चुकी थी। यह शर्मनाक है।”

लेखिका मारिया मलिक ने जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने खुद इस थ्योरी को नकार दिया था। मारिया ने लिखा,
“हमें याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान में हिन्दू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। ऐसे बयानों से उनकी सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं।”

अमार राशिद, लेखक और शोधकर्ता, ने सवाल उठाया,
“जब 50 लाख हिन्दू पाकिस्तान में रहते हैं, तब एक सेना प्रमुख को ऐसा भेदभावपूर्ण बयान देने का क्या अधिकार है? क्या ये पेशेवर आचरण है?”

सूफी स्कॉलर सबाहत ज़कारिया ने अपने तीखे सवालों में पूछा,
“अगर भारत के 20 करोड़ मुसलमान ‘अलग’ हैं, तो क्या पाकिस्तान उन्हें अपनाने को तैयार है? और जो अफगान मुसलमान दशकों से पाकिस्तान में रह रहे हैं, उन्हें क्यों निकाला जा रहा है? टू नेशन थ्योरी वहां क्यों नहीं लागू होती?”


इतिहासकार और विश्लेषकों की राय

प्रख्यात इतिहासकार इश्तियाक़ अहमद ने कहा,
“टू नेशन थ्योरी का सबसे बड़ा नुकसान मुसलमानों को ही हुआ है—भारत के मुसलमान अलग रह गए, बांग्लादेश ने अलग देश बना लिया। अगर हम हिन्दुओं से अलग हैं, तो चीन से क्या समानता है, जिससे हम इतनी नज़दीकी बढ़ा रहे हैं?”

उन्होंने आगे कहा,
“हमें हिन्दुओं से दुश्मनी की ज़रूरत क्यों है? हमने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी। पाकिस्तान को अब यह दिखाना चाहिए कि वह सफल देश है, न कि बार-बार दुश्मनी को आधार बनाकर खुद को परिभाषित करता रहे।”


नजम सेठी का विश्लेषण

वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी ने इस भाषण को रणनीतिक बताया। उन्होंने कहा कि ओवरसीज़ पाकिस्तानी अक्सर इमरान खान के समर्थक रहे हैं। सेना अब उन्हें अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है।

उनके मुताबिक,
“मुनीर ने कश्मीर और बलूचिस्तान दोनों का ज़िक्र करके भारत को संदेश देने की कोशिश की है। यह एक बड़ा राजनीतिक संकेत है।”


निष्कर्ष

जनरल मुनीर की टिप्पणियां केवल भारत के खिलाफ नहीं थीं, बल्कि उन्होंने पाकिस्तान के अंदर मौजूद गहराई से जुड़े सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों को भी छेड़ दिया। पाकिस्तान के अंदर से ही जो आलोचना उठी है, वह यह दिखाती है कि देश में अब हर प्रकार की कट्टर सोच को चुनौती दी जा रही है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपनी विचारधारा में आत्ममंथन करेगा या फिर पुराने नारों के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करता रहेगा?


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