नई दिल्ली:
ईरान के पूर्व शाह के पुत्र और निर्वासित राजकुमार रेजा पहलवी लगभग पांच दशकों से अपनी मातृभूमि की सत्ता से दूर हैं। लेकिन ईरान पर हाल ही में हुए विदेशी हमलों और बढ़ते राजनीतिक दबाव ने उन्हें फिर से चर्चा में ला दिया है। पहलवी ने इसे “ईरान का बर्लिन वॉल मोमेंट” बताते हुए खुद को सत्ता संक्रमण का अगुवा घोषित किया है।
“अब वक्त है बदलाव का”
सोमवार को एक सार्वजनिक संबोधन में पहलवी ने कहा:
“यह हमारे लिए वह क्षण है जब एक नई शुरुआत की जा सकती है—एक ऐसा ईरान जो लोकतांत्रिक हो, अपने पड़ोसियों के साथ शांति से रहे और विकास का केंद्र बने।”
उन्होंने खुद को उस राष्ट्रीय परिवर्तन की अगुवाई करने वाला बताया जिसकी कल्पना वह वर्षों से कर रहे हैं।
राजशाही की विरासत और जनता से अपील
रेजा पहलवी, जो शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के बेटे हैं, 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका चले गए थे और वहीं से लगातार ईरान की धार्मिक सत्ता की आलोचना करते रहे हैं। अब वे सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से आह्वान कर रहे हैं कि वे मौजूदा सरकार का साथ छोड़ें और एक नए, लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण में जुड़ें।
उन्होंने ईरानी जनता से कहा:
“इस्लामी गणराज्य के पतन के बाद डरने की कोई जरूरत नहीं है। यह देश गृहयुद्ध में नहीं फंसेगा, बल्कि स्थिरता और पुनर्निर्माण की ओर बढ़ेगा।”
ईरान पर हमले और अमेरिका का रुख
बीते दिनों ईरान पर इज़राइल और अमेरिका दोनों ने हमले किए। इज़राइल ने 12 दिनों तक ईरान के परमाणु ठिकानों और सैन्य अड्डों को निशाना बनाया, और अमेरिका ने तीन प्रमुख परमाणु स्थलों पर हमला किया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम संकेत दिए कि अगर मौजूदा सरकार नाकाम रही तो “रेजीम चेंज” भी संभव है।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा:
“अगर मौजूदा ईरानी सरकार ईरान को फिर से महान नहीं बना सकती, तो फिर सत्ता परिवर्तन क्यों नहीं?“
हालांकि, सीज़फायर के बाद ट्रंप ने नरमी बरतते हुए कहा कि वे “राजनीतिक अस्थिरता नहीं चाहते” और ईरान से संभावित संबंधों की भी बात कही।
क्या पहलवी को मिलेगा मौका?
हालांकि रेजा पहलवी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लगातार सक्रिय हैं और उन्होंने जानकारी दी कि ईरानी सत्ता के कई शीर्ष अधिकारी अपने परिवारों को देश से बाहर भेजने की तैयारी में हैं, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरण उनके लिए अनिश्चितता भी लेकर आए हैं।
“खामेनेई और उसका गिरता शासन ईरान के लोगों को धोखा दे चुका है। यदि ईरान को बचाना है, तो सत्ता से हटना ही एकमात्र रास्ता है,” उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा।
लेकिन अब जब अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बातचीत की संभावनाएं जताई जा रही हैं, और युद्ध का खतरा फिलहाल टल चुका है, तब सवाल यह है कि क्या रेजा पहलवी का यह सुनहरा मौका भी हाथ से निकल जाएगा?
निष्कर्ष
रेजा पहलवी के लिए यह क्षण अवसर और अनिश्चितता दोनों लेकर आया है। जहां एक ओर सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं दिख रही थीं, वहीं अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के चलते रास्ता फिर से कठिन होता नजर आ रहा है।
ईरान की जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब तय करना है कि क्या वे अतीत के शाही उत्तराधिकारी को भविष्य की ओर ले जाने वाला नेता मानते हैं या नहीं।
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