मुल्तान, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का ऐतिहासिक शहर, जिसे सदियों से सूफियों का शहर कहा जाता रहा है, 19वीं सदी की शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे अहम लड़ाइयों में से एक का केंद्र बना। इस टकराव का नायक था — महाराजा रंजीत सिंह, और निर्णायक हथियार — ज़मज़मा तोप।
🕌 मुल्तान: एक समृद्ध विरासत
11वीं-12वीं सदी में कई सूफ़ी संतों ने मुल्तान को अपना ठिकाना बनाया, जिससे इसे “औलिया का शहर” कहा जाने लगा। यहाँ स्थित हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया का मजार आज भी श्रद्धा का केंद्र है।
मुग़ल शासन (1557 ई.) में यह शहर लगभग दो सदियों तक शांत और समृद्ध रहा, कृषि, घोड़े और रेशम व्यापार का केंद्र बनकर।
💰 मुल्तान पर लुटेरों की नजर
इसकी उर्वर ज़मीन और समृद्धि ने पहले मराठों, फिर सिखों, और अंत में रंजीत सिंह को आकर्षित किया। नवाब मुज़फ़्फ़र ख़ान सदोज़ई, जिन्होंने 1757 से 1818 तक मुल्तान पर शासन किया, लगातार सिख ताकत से जूझते रहे।
रंजीत सिंह ने मुल्तान पर 1802 से 1818 तक कुल सात हमले किए। शुरुआती वर्षों में यह संघर्ष टैक्स और अधीनता के इर्द-गिर्द घूमता रहा। लेकिन अंततः 1818 में, महाराजा ने मुल्तान को हमेशा के लिए जीतने की ठान ली।
⚔️ 1818 का निर्णायक अभियान
जनवरी 1818 में, महाराजा ने एक विशाल सैन्य अभियान शुरू किया। रसद की सप्लाई के लिए रावी, झेलम और चिनाब नदियों पर विशेष व्यवस्था की गई। प्रमुख कमांड दी गई दीवान चंद को, जबकि नेतृत्व प्रतीकात्मक रूप से राजकुमार खड़क सिंह के हाथों में रहा।
शहर और किले की घेराबंदी महीनों चली। प्रारंभिक हमले बिखरे और असंगठित थे, जिससे दीवारें तो कमजोर हुईं लेकिन निर्णायक प्रवेश नहीं हो सका।
💣 ज़मज़मा तोप की वापसी
अप्रैल में लाया गया आखिरी हथियार था — ज़मज़मा तोप, एक विशालकाय तोप जो 80 पाउंड वजनी गोले दाग सकती थी। इससे किले की दीवारों में बड़ी दरारें आने लगीं।
एक बार तोप का पहिया टूट गया, तो सिख सैनिक अपनी जान की बाज़ी लगाकर उसे सहारा देने के लिए आगे बढ़े — ये लोग ‘मौत को गले लगाने’ को तैयार थे ताकि दीवारें गिर सकें।
🗡️ साधु सिंह की बगैर आदेश कार्रवाई और अंतिम जीत
2 जून को अकाली सैनिक साधु सिंह और उनके साथियों ने बिना आदेश किले पर धावा बोल दिया। उनका यह अचानक हमला प्रभावी साबित हुआ और सिख फौजें पीछे से समर्थन में उतर पड़ीं।
नवाब मुज़फ़्फ़र ख़ान, उनके बेटे और रक्षकों ने अंतिम दम तक संघर्ष किया, लेकिन किला टूट चुका था। नवाब की मौत उनके आवास द्वार पर हुई, जबकि उनका बेटा सरफ़राज़ ख़ान बंदी बना लिया गया।
🪙 लूट, इनाम और सख्ती
किले पर कब्जे के बाद जब सिख फौजों ने लूट शुरू की, तो रंजीत सिंह ने आदेश जारी किया कि सारा लूटा गया माल राज्य के खजाने में जमा किया जाए। जो नहीं मानते, उन्हें सज़ा दी गई।
दीवान चंद को “ज़फ़र जंग बहादुर” की उपाधि और 25,000 रुपये की जागीर मिली, जबकि आम सैनिकों को मुल्तानी रेशमी लिबास से नवाज़ा गया।
🏰 मुल्तान की फ़तह का ऐतिहासिक महत्व
इस फ़तह से:
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अफ़ग़ान प्रभाव पंजाब और सिंधु क्षेत्र से समाप्त हो गया।
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रंजीत सिंह का लाहौर दरबार पंजाब का निर्विवाद शक्ति केंद्र बन गया।
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पेशावर, डेरा गाज़ी ख़ान, बहावलपुर जैसे इलाक़ों तक सिख राज्य का विस्तार संभव हुआ।
ज़मज़मा तोप न केवल एक हथियार थी, बल्कि यह रंजीत सिंह की रणनीतिक सोच और सिख सैन्य जोश की प्रतीक बन गई।
📜 निष्कर्ष
मुल्तान की जीत केवल एक शहर की फतह नहीं थी — यह सिख साम्राज्य की निर्णायक सैन्य और राजनीतिक विजय थी, जिसने अफ़ग़ान वर्चस्व को समाप्त किया और पंजाब को एकीकृत किया।
और इस पूरी गाथा में ज़मज़मा तोप एक मौन लेकिन शक्तिशाली नायक के रूप में याद की जाती है — जिसने इतिहास की धारा मोड़ दी।
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