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क्या है डिजिटल डिमेंशिया?
डिजिटल डिमेंशिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें ज्यादा स्मार्टफोन, कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करने से इंसान की याददाश्त और ध्यान देने की क्षमता कमजोर हो जाती है। इस शब्द को जर्मनी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. मैनफ्रेड स्पिट्ज़र ने दिया था।
डिजिटल डिमेंशिया के लक्षण
डिजिटल डिमेंशिया के लक्षण अल्जाइमर जैसे होते हैं:
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चीजें जल्दी भूल जाना
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ध्यान न लगना
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सोचने और समझने में परेशानी
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कन्फ्यूज़ रहना
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नंबर और शब्द याद न रहना
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बिना गूगल या मैप्स के रास्ता न समझ पाना
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छोटी-छोटी बातों पर घबरा जाना
किन उम्र के लोगों को ज्यादा खतरा?
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WHO के मुताबिक डिमेंशिया का खतरा 65 साल से ऊपर के लोगों में ज्यादा होता है।
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लेकिन नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार 30-40 साल की उम्र के युवा, खासकर जेनरेशन Z और मिलेनियल्स (1980 के बाद जन्मे लोग) जो बहुत ज्यादा मोबाइल या कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं, उनमें भी इसके लक्षण देखे जा सकते हैं।
रिसर्च में क्या कहा गया?
University of Texas और Baylor University की रिसर्च में बताया गया कि 50 साल से ज्यादा उम्र के जो लोग स्मार्टफोन और इंटरनेट का सही इस्तेमाल करते हैं, उनकी याददाश्त बेहतर रहती है। यानी कि बुजुर्गों के लिए टेक्नोलॉजी सही तरीके से उपयोग करना फायदेमंद हो सकता है।
क्या डिमेंशिया का इलाज है?
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डिमेंशिया का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन लाइफस्टाइल में बदलाव, दवाइयों, मानसिक व्यायाम, सामाजिक जुड़ाव और शारीरिक एक्टिविटी से इसे कंट्रोल किया जा सकता है।
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अब तो आंखों की जांच से भी डिमेंशिया का पता लगाया जा सकता है।
सावधानी क्या रखें?
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हर छोटी बात के लिए गूगल पर निर्भर न हों
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दिमाग का इस्तेमाल करें, जैसे छोटी गणनाएं खुद करें
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डिजिटल ब्रेक लें
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मानसिक और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लें
याद रखें: टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल हमें फायदा दे सकता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से दिमाग कमजोर भी हो सकता है।
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