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तिब्बत के दलाई लामा: निर्वासन में बीता जीवन — 10 अहम पड़ाव

दलाई लामा 6 जुलाई को अपना 90वां जन्मदिन मनाने जा रहे हैं।
दशकों से निर्वासन में जीवन जी रहे इस शांतिदूत, बौद्ध भिक्षु और नोबेल पुरस्कार विजेता ने तिब्बती लोगों का नेतृत्व कठिनतम दौर में किया है।

वे स्वयं को केवल “एक साधारण बौद्ध भिक्षु” मानते हैं, और आज भी उनका जीवन प्रार्थना, साधना और अनुशासन से भरा हुआ है।
यहां जानिए उनके जीवन से जुड़ी 10 प्रमुख तिथियां, जो उनके सफर को परिभाषित करती हैं:


1935: एक किसान परिवार में जन्म

6 जुलाई, 1935 को ल्हामो थोंडुप का जन्म तिब्बत के ताकत्सेर गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ।
उस समय तिब्बत चीन के किंग राजवंश और ब्रिटिश प्रभाव से बाहर आकर स्वायत्त शासन में था।


1937: 14वें अवतार की खोज

महज दो वर्ष की आयु में कुछ बौद्ध भिक्षु वेश बदलकर उनके गांव पहुंचे। उन्हें विश्वास हुआ कि यह बालक ही दिवंगत 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म है, जब उस बच्चे ने उनके द्वारा लाए गए माला को पहचान लिया।
1940 में, उन्हें दलाई लामा के रूप में अभिषेक दिया गया और नाम मिला तेन्ज़िन ग्यात्सो


1950: चीन का नियंत्रण

चीनी सेना तिब्बत में प्रवेश करती है और स्थानीय प्रतिरोध को कुचल देती है। बीजिंग इसे “शांतिपूर्ण मुक्ति” कहता है।


1954: माओ से मुलाकात

दलाई लामा बीजिंग जाते हैं और चीन के सर्वोच्च नेता माओ ज़ेदोंग से मिलते हैं, जो उन्हें कहते हैं —
“धर्म ज़हर है।”


1959: भारत में शरण

तिब्बत में विद्रोह को दबाने के लिए चीन सेना भेजता है। दलाई लामा ल्हासा से भाग निकलते हैं।
काफी बीमार होने के कारण वे घोड़े पर नहीं बैठ सकते थे, इसलिए ‘जोमो’ (गाय-याक की संकर नस्ल) की पीठ पर सवार होकर बर्फीले पहाड़ों को पार करते हैं और भारत पहुंचते हैं।
भारत, धर्मशाला में तिब्बती निर्वासित सरकार को जगह देता है। चीन उन्हें “भिक्षु के वस्त्रों में भेड़िया” कहता है।


1967: वैश्विक अभियान की शुरुआत

दलाई लामा जापान और थाईलैंड का दौरा करते हैं — यह उनके अंतरराष्ट्रीय समर्थन अभियान की शुरुआत होती है।
इस दौरान वे कई विश्व नेताओं और हॉलीवुड हस्तियों से भी मिलते हैं।
इसी समय चीन में चल रही सांस्कृतिक क्रांति (1966–76) तिब्बत में भारी विनाश लाती है।


1988: ‘मध्य मार्ग’ का प्रस्ताव

वे पूर्ण स्वतंत्रता की मांग छोड़ते हैं और “मध्य मार्ग” की वकालत करते हैं — जिसमें तिब्बत को चीन के भीतर रहते हुए अधिक स्वायत्तता मिले।
बीजिंग उन्हें अब भी अलगाववादी कहता है।


1989: नोबेल शांति पुरस्कार

उन्हें नोबेल पीस प्राइज से सम्मानित किया जाता है — उनके शांतिपूर्ण प्रयासों, सहिष्णुता और संवाद की नीति के लिए।
चीन इस पुरस्कार को “हास्यास्पद” कहकर खारिज करता है, खासकर उस वक्त जब ल्हासा में आज़ादी की मांग को कुचल दिया गया था।


2011: राजनीति से संन्यास

दलाई लामा निर्वासित सरकार के राजनीतिक नेतृत्व से औपचारिक रूप से हटते हैं और यह जिम्मेदारी एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेता को सौंपते हैं।


आज: प्रार्थना और साधना का जीवन

आज भी वे एक कठोर धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं।
“मैं खुद को हमेशा एक साधारण बौद्ध भिक्षु मानता हूं। यही मेरी असली पहचान है,” वे अपनी वेबसाइट पर लिखते हैं।

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