अंकारा/मॉस्को:
एक ओर रूस से गर्मजोशी दिखाना, दूसरी ओर उसके दुश्मन को खतरनाक हथियार देना – तुर्किए की यही रणनीति अब वैश्विक चर्चा का विषय बन गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्किए ने यूक्रेन को घातक Bayraktar TB2 ड्रोन सप्लाई किए, जिनकी मदद से यूक्रेनी सेना ने रूस के लगभग 40 लड़ाकू और बमवर्षक विमान तबाह कर दिए।
यह सब तब हुआ जब रूस-तुर्किए संबंध सतह पर सामान्य और सहयोगात्मक दिखाई दे रहे थे।
रूस का ‘दोस्त’ तुर्किए, लेकिन व्यवहार ‘दुश्मन’ जैसा?
तुर्किए लंबे समय से ऐसी विदेश नीति अपनाता रहा है जिसमें वह इस्लामिक दुनिया की अगुवाई, नाटो की सदस्यता, और रूस जैसे शक्ति केंद्रों से कारोबारी संबंध – तीनों को एक साथ साधने की कोशिश करता है।
जब अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तो तुर्किए ने खुलकर उन पर सवाल उठाए और रूस के पर्यटकों व कारोबारियों के लिए अपने दरवाजे खुले रखे। कई रूसी कंपनियों ने तुर्किए को शिफ्ट कर अपना संचालन शुरू भी किया।
लेकिन अब खबर सामने आई है कि तुर्किए ने यूक्रेन को वो हथियार दिए, जिनसे रूस की वायुसेना को भारी नुकसान झेलना पड़ा।
Bayraktar TB2: वही ड्रोन, जो बना रूस के लिए ‘डर’
तुर्किए निर्मित Bayraktar TB2 ड्रोन को हल्का, सटीक और बेहद घातक माना जाता है। निगरानी और हमला – दोनों कामों में माहिर यह ड्रोन कम लागत में ज़्यादा असर करता है। इसकी पहली उड़ान 2014 में हुई थी और अब तक 600 से ज्यादा यूनिट्स बन चुके हैं।
यूक्रेन को इन ड्रोन की आपूर्ति 2019 से शुरू हुई, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद 8 अतिरिक्त यूनिट्स भेजे गए, जो निर्णायक साबित हुए।
ड्रोन सप्लाई के पीछे अमेरिका की छाया?
विश्लेषकों का मानना है कि तुर्किए ने ये कदम सिर्फ यूक्रेन की मदद के तौर पर नहीं उठाया, बल्कि अमेरिका और नाटो देशों को खुश करने के लिए यह एक रणनीतिक चाल भी थी।
अमेरिका तुर्किए पर लंबे समय से दबाव बनाता रहा है कि वह रूस से दूरी बनाए रखे और नाटो की नीतियों के अनुरूप चले। ऐसे में तुर्किए ने रूस से रिश्ते कायम रखने का नाटक करते हुए, यूक्रेन को मदद देकर दोनों तरफ खेलने की कोशिश की।
रूस की नाराज़गी: भरोसे की नींव हिल गई?
क्रेमलिन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, पुतिन सरकार तुर्किए के इस रुख को “विश्वासघात” मान रही है। हालांकि आधिकारिक बयान में तीखे शब्दों से परहेज़ किया गया है, लेकिन मॉस्को और अंकारा के बीच कूटनीतिक दरारें अब खुलकर सामने आ रही हैं।
दूसरी तरफ तुर्किए खुद को एक ‘मध्यस्थ’ और ‘संतुलित ताकत’ के तौर पर पेश करता आ रहा है – लेकिन अब उसकी दोहरी नीति उजागर हो चुकी है।
न भारत का, न रूस का – तुर्किए कहां खड़ा है?
तुर्किए ने हाल ही में भारत के कुछ कूटनीतिक और सुरक्षा हितों के खिलाफ भी आवाज़ उठाई थी, जिससे दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ा। और अब रूस को धोखा देकर, तुर्किए ने खुद को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उसकी भरोसेमंद छवि दोनों मोर्चों पर टूटती नजर आ रही है।
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