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दिल्ली में पानी का संकट: बूंद-बूंद को तरसते परिवार, रसोई से महंगा हो रहा पीने का पानी

दिल्ली की झुलसाती गर्मी के बीच राजधानी में जल संकट तेजी से गहराता जा रहा है। रोहिणी सेक्टर 34 की 65 वर्षीय शकुंतला देवी दिन में दो बार आधे घंटे मोटर चलाती हैं, लेकिन अक्सर उन्हें सिर्फ एक गिलास पानी ही मिल पाता है। किराए के फ्लैट में रहने वाली शकुंतला देवी कहती हैं, “पता है पानी नहीं आएगा, फिर भी उम्मीद में मोटर चलाती हूं कि शायद आज किस्मत साथ दे।”

पेंशन पानी में बह रही है

शकुंतला देवी समेत तमाम स्थानीय लोगों को पीने का पानी बाज़ार से खरीदना पड़ता है। 20 लीटर की एक बोतल ₹40 में मिलती है और कभी-कभी एक दिन में दो बोतलें लग जाती हैं। वह बताती हैं कि उनकी पूरी वृद्धावस्था पेंशन से ज़्यादा खर्च सिर्फ पानी पर हो जाता है।

दीपक नाम के एक स्थानीय निवासी कहते हैं, “हम ब्रांडेड पानी नहीं ले सकते। ग्राउंड फ्लोर पर होने के बावजूद ₹30 में एक बोतल लेनी पड़ती है।” उनकी पत्नी जोड़ती हैं, “पानी खरीदना बंद हो जाए तो हमारा घरेलू बजट संभल सकता है।”


जरूरत और आपूर्ति में गहरी खाई

दिल्ली जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी को प्रतिदिन लगभग 129 करोड़ गैलन पानी की जरूरत होती है, लेकिन आपूर्ति केवल 100 करोड़ गैलन तक सीमित है। यानी रोजाना करीब 30 करोड़ गैलन की कमी है।

इसका सीधा असर दक्षिणी दिल्ली के संगम विहार से लेकर उत्तर-पश्चिम के इलाकों तक लाखों परिवारों पर पड़ा है, जहां कई घरों में जल बोर्ड के टैंकर भी नहीं पहुंचते।

‘खाने से ज्यादा खर्च पानी का’

देवली इलाके में रहने वाली कटोरी देवी कहती हैं, “पिछले दो महीने से पानी नहीं आया। ₹1500 में एक टैंकर खरीदना पड़ता है। एसी से गिरने वाले पानी को भी इकट्ठा करते हैं ताकि कुछ काम आ जाए।” उनकी बहू सीमा देवी कहती हैं, “रसोई के सामान से ज्यादा खर्च पानी का हो रहा है।”


झुग्गियों और अनधिकृत कॉलोनियों की दुर्दशा

दिल्ली की 1700 से ज्यादा अनधिकृत कॉलोनियों में पानी की समस्या सामान्य है। कई स्थानों पर पाइपलाइन तो बिछी है, लेकिन आपूर्ति बेहद कम या अनियमित है।

वसंत कुंज जैसे विकसित इलाकों में भी समस्या कम नहीं। पूजा भाटिया, जो डीडीए फ्लैट में रहती हैं, बताती हैं, “यहां टैंकर का पानी भूजल से मिलाकर आता है। उसका टीडीएस इतना ज्यादा होता है कि पीने लायक नहीं होता। हमें ₹25,000 में RO लगवाना पड़ा, जिसकी सालाना सर्विसिंग में ₹6000 खर्च होता है।”


टैंकर की मारामारी और महंगी बोतलें

चाणक्यपुरी स्थित विवेकानंद झुग्गी में रोजाना टैंकर के लिए कतारें लगती हैं। बच्चे टैंकर पर पहले चढ़ने के लिए दौड़ लगाते हैं। टैंकर आने से पहले अक्सर बहस और धक्का-मुक्की तक हो जाती है।

वहीं, किराना दुकानों पर पानी की बोतलों का अंबार है। एक दुकानदार बताता है, “अधिकतर घरों में रोज एक-दो बोतलें जाती हैं। ब्रांडेड पानी ₹90-₹100 तक बिकता है।”


विशेषज्ञों की राय: सिर्फ आपूर्ति नहीं, सोच भी बदलिए

नीति आयोग के जल प्रबंधन सूचकांक में दिल्ली देश का दूसरा सबसे जल-संकटग्रस्त शहर है। पानी की लगभग 61% आपूर्ति यमुना, 30% गंगा नहर, और 9% भूजल से होती है।

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर के विशेषज्ञ नितिन बस्सी के अनुसार, “जो पानी भेजा जाता है, उसका करीब 40% लीक या चोरी हो जाता है।” उनका सुझाव है कि पाइप लीकेज रोकना, जल चोरी पर अंकुश और कम खपत वाले उपकरणों को बढ़ावा देना जरूरी है।

वहीं, प्रोफेसर दिनेश कांडपाल का मानना है कि “अगर ये संकट बरकरार रहा तो सामाजिक तनाव और असमानता और भी गहराएगी।”


समाधान की दिशा में क्या हो रहा है?

दिल्ली जल बोर्ड ने टैंकरों की संख्या बढ़ाई है, GPS ट्रैकिंग शुरू की है और पानी वितरण की निगरानी बढ़ाई है। फिर भी बोर्ड खुद भारी कर्ज में डूबा है—₹73,000 करोड़ से अधिक का।

विशेषज्ञ मानते हैं कि मुफ्त पानी की सुविधा सिर्फ ज़रूरतमंदों तक सीमित की जाए और जो सक्षम हैं उनसे यथोचित मूल्य लिया जाए ताकि बुनियादी ढांचे में सुधार हो सके।


निष्कर्ष: आदतें बदलें, नीति बदलें

दिल्ली का जल संकट केवल जल बोर्ड की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जल नीति, आदतों और सोच की भी परीक्षा है। क्या हम समय रहते खुद को और अपने शहर को पानी के लिए तैयार कर पाएंगे? जवाब भविष्य में छुपा है — लेकिन तैयारी आज से ही शुरू करनी होगी।

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