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धरती पर बड़ा भूगोल परिवर्तन: अफ्रीका दो हिस्सों में बंटने की ओर, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

नई दिल्ली: अफ्रीकी महाद्वीप में भूवैज्ञानिक गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है, जो भविष्य में इस महाद्वीप को दो हिस्सों में बांट सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पूर्वी अफ्रीका में दो टेक्टोनिक प्लेटों—न्युबियन और सोमालियाई—के बीच लगातार दूरी बढ़ रही है, जिससे एक नया महासागर जन्म ले सकता है।

पृथ्वी की सतह के नीचे बदलाव की आहट

पृथ्वी की सतह के नीचे स्थित विशाल टेक्टोनिक प्लेटें धीमी गति से खिसकती हैं। यह खिसकाव लाखों वर्षों में बड़े पैमाने पर भूगोलिक बदलाव ला सकता है। पूर्वी अफ्रीका में न्युबियन और सोमालियाई प्लेटें अलग हो रही हैं, जिससे ‘ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट सिस्टम’ (EARS) तेजी से सक्रिय हो रहा है।

अफ्रीका में फट रही धरती

EARS करीब 3,500 किलोमीटर में फैला हुआ है, जो इथियोपिया से लेकर मोजाम्बिक तक फैला है। यहां जमीन में दरारें और भ्रंश बन रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यही प्रक्रिया धीरे-धीरे एक नए महासागर का निर्माण कर सकती है, जो अफ्रीका को दो भागों में विभाजित कर देगा।

अफार की घटना: प्रकृति का इशारा

2005 में इथियोपिया के अफार क्षेत्र में आए भूकंपों की श्रृंखला के बाद 60 किलोमीटर लंबी और 10 मीटर गहरी दरार बन गई थी। इस घटना को विशेषज्ञ अफ्रीका के विभाजन की दिशा में एक बड़ा संकेत मानते हैं। हर साल यह दरार करीब आधा इंच बढ़ रही है।

कौन-कौन से देश होंगे प्रभावित?

इस प्रक्रिया से इथियोपिया, सोमालिया, केन्या और तंजानिया जैसे देश सीधे प्रभावित होंगे। साथ ही, युगांडा, जाम्बिया और रवांडा जैसे लैंडलॉक्ड देशों को संभावित रूप से समुद्र तक पहुंच मिल सकती है। वहीं, अफ्रीका का एक हिस्सा पूरी तरह अलग होकर नया महाद्वीप बन सकता है, जिसे कुछ वैज्ञानिक ‘न्युबियन प्लेट’ के नाम से संबोधित कर रहे हैं।

नया महासागर: समय और परिणाम

पहले माना जाता था कि यह विभाजन करोड़ों साल लेगा, लेकिन हालिया शोधों से संकेत मिला है कि यह प्रक्रिया 5 से 10 लाख साल में पूरी हो सकती है। भूकंप और ज्वालामुखी जैसी घटनाएं इस प्रक्रिया को और तेज कर सकती हैं। इससे अफ्रीका की जलवायु, जैव विविधता और कृषि प्रणाली में भारी बदलाव संभव है।

इतिहास खुद को दोहराता है?

यह बदलाव गोंडवाना लैंड के टूटने जैसी प्रक्रिया का दोहराव हो सकता है, जब अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका अलग होकर अटलांटिक महासागर बना था। वैज्ञानिक GPS, सैटेलाइट और भूकंपीय डेटा के जरिए इस बदलाव की निगरानी कर रहे हैं, ताकि भविष्य की तैयारी की जा सके।

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