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पहलगाम हमले पर मुस्लिम देशों की चुप्पी: कूटनीति या रणनीतिक मजबूरी?

नई दिल्ली/जम्मू-कश्मीर:
22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर सतह पर है। 26 निर्दोषों की मौत के बाद जहां भारत में आक्रोश है, वहीं वैश्विक प्रतिक्रियाओं में खासकर मुस्लिम देशों की ओर से एक सधी हुई, बल्कि चुप्प साधने वाली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

कई मुस्लिम देश इस त्रासदी पर सार्वजनिक रूप से न तो पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं और न ही उसकी आलोचना कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे राजनीतिक-सामरिक हित और आर्थिक साझेदारियों का संतुलन प्रमुख कारण हैं।


ईरान: मध्यस्थता की पेशकश, लेकिन स्पष्ट पक्ष नहीं

ईरान ने पहलगाम हमले के बाद खुद को एक न्यूट्रल मध्यस्थ के तौर पर पेश किया है। पहले भी वह भारत-पाक संघर्ष में संवाद की पेशकश करता रहा है। 370 के मुद्दे पर भी ईरान ने कोई मजबूत विरोध दर्ज नहीं कराया था। इसका ध्यान वर्तमान में अमेरिका और सऊदी अरब के साथ अपने टकरावों पर केंद्रित है।


सऊदी अरब: चुप्पी में ही कूटनीति

भारत के लिए एक प्रमुख ऊर्जा साझेदार और पाकिस्तान के पारंपरिक सहयोगी सऊदी अरब ने इस बार भी कोई स्पष्ट बयान जारी नहीं किया। जानकारों के अनुसार, यह सऊदी का रणनीतिक संतुलन है — एक तरफ भारत के साथ बढ़ता हुआ व्यापार और ‘विजन 2030’, दूसरी तरफ पारंपरिक इस्लामी एकजुटता का दबाव।

370 के मुद्दे पर भी सऊदी ने इसी तरह तटस्थ रवैया अपनाया था, जिससे यह रुख कोई नई बात नहीं है।


कतर: क्षेत्रीय स्थिरता की प्राथमिकता

कतर ने भी इस बार कोई सार्वजनिक समर्थन या विरोध नहीं जताया। एक मुस्लिम अमीर देश होते हुए भी उसकी विदेश नीति क्षेत्रीय शांति और आर्थिक विकास पर केंद्रित रही है। 2017-21 की नाकाबंदी के बाद कतर अब किसी भी क्षेत्रीय टकराव से दूरी बनाए रखना चाहता है।

370 के मामले में भी कतर ने वार्ता और समाधान की बात कही थी, न कि किसी पक्ष की आलोचना।


यूएई: रणनीति में लचीलापन, भारत की प्राथमिकता बरकरार

यूएई ने भारत द्वारा सिंधु जल संधि स्थगन की कोमल आलोचना की थी, लेकिन उसने पाकिस्तान के साथ खुलकर खड़ा होने से परहेज किया। भारत-यूएई के बीच 85 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार इस रुख की मुख्य वजह है।

गौरतलब है कि 2019 में अनुच्छेद 370 के समय यूएई ने भारत के फैसले को आंतरिक मामला करार दिया था। इससे यह साफ होता है कि यूएई के लिए आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी पाकिस्तान से कहीं अधिक भारत के साथ मजबूत है।


तुर्की: कूटनीतिक बयान, कोई ठोस कदम नहीं

तुर्की ने ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया है, विशेषकर कश्मीर मुद्दे पर। हालांकि, इस बार तुर्की की प्रतिक्रिया राजनयिक बयानों तक सीमित रही है। भारत-तुर्की व्यापार संबंधों में तेजी के चलते अब तुर्की भी खुलकर विरोध से बचता दिख रहा है।

370 के समय तुर्की ने UN में भारत के खिलाफ आवाज उठाई थी, लेकिन 2025 की परिस्थितियों में उसका संयमित रवैया यह दिखाता है कि वह भारत के साथ आर्थिक रिश्ते पूरी तरह से नहीं तोड़ना चाहता।


निष्कर्ष: मुस्लिम देशों की प्राथमिकता — संतुलन और स्वार्थ

पहलगाम हमले के बाद की प्रतिक्रियाएं यह संकेत देती हैं कि मुस्लिम दुनिया अब भारत-पाक संघर्षों में भावनात्मक या धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक संतुलन के आधार पर कदम उठा रही है। पाकिस्तान को बिना शर्त समर्थन देने की परंपरा अब टूटती दिख रही है।

यह बदलती वैश्विक राजनीति और भारत की बढ़ती कूटनीतिक पकड़ का संकेत है।

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