ऊपरी मुस्तांग, नेपाल:
नेपाल के ऊपरी हिमालय में बसा एक छोटा-सा बौद्ध गांव समजुंग कभी अपनी शांत और आत्मनिर्भर जीवनशैली के लिए जाना जाता था। 13,000 फीट से भी ऊंचाई पर स्थित यह गांव याक और भेड़ों को पालने, जौ की खेती करने और हज़ारों साल पुराने ‘आकाश गुफाओं’ के बीच जीता था।
लेकिन फिर वहां पानी खत्म हो गया।
पहाड़ों की बर्फ कम होती गई, झरने सूख गए और जब बारिश होती, तो इतनी ज़ोरदार कि खेत बह जाते और मिट्टी के घर ढह जाते। धीरे-धीरे लोग गांव छोड़ते गए।
🌍 जलवायु परिवर्तन की सीधी मार
हिंदू कुश और हिमालय क्षेत्र, जो पूरी दुनिया में आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद सबसे ज़्यादा बर्फ समेटे हुए है, तेजी से गर्म हो रहा है। यहाँ के ग्लेशियर लाखों लोगों के जीवन का आधार हैं – और वही अब तेजी से पिघल रहे हैं।
कुंगा गुरंग, 54, ने कहा:
“हमने गांव इसलिए छोड़ा क्योंकि अब वहाँ पानी नहीं बचा। तीन झरने थे, और तीनों सूख गए।”
ICMOD (International Centre for Integrated Mountain Development) के मुताबिक, जल संकट अब स्थायी रूप ले चुका है। बारिश का पैटर्न बदल रहा है और ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं।
🏞️ नया गांव, नई शुरुआत
करीब 15 किलोमीटर दूर, काली गंडकी नदी के किनारे, नए समजुंग की नींव रखी गई। गांव के लोगों ने खुद अपने लिए नहरें खोदीं, मवेशियों के लिए आश्रय बनाए और पानी की लाइनें बिछाईं। यह सब करने में उन्हें कई साल लगे।
नेपाल की रियासत भले खत्म हो चुकी हो, लेकिन पुराने मुस्तांग के राजा ने नई ज़मीन दी, जिससे यह पुनर्वास संभव हो पाया।
पेमा गुरंग (18) और तोशी लामा गुरंग (22) कहती हैं कि वे पुराने गांव की धुंधली यादें ही रखती हैं, लेकिन नई जगह पर पानी के लिए संघर्ष नहीं करना उनके लिए सबसे बड़ी राहत है।
तोशी कहती हैं:
“वो हमारी जड़ों की जगह थी। हम वापसी की चाह रखते हैं… लेकिन अब शायद कभी संभव नहीं होगा।”
🌡️ गांव नहीं बचे, तो संस्कृति कैसे बचेगी?
हिमालय के ऊंचे इलाकों में, जहां हर साल बर्फबारी का कम होना एक सामान्य बात बन गई है, वहां ना सिर्फ जीवनशैली, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान भी खतरे में है।
ग्लोबल रिपोर्ट्स कहती हैं कि अगर ग्रीनहाउस गैसें ऐसे ही फैलती रहीं, तो इस सदी के अंत तक 80% हिमालयी ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं।
💡 एक वैश्विक चेतावनी
समजुंग गांव की कहानी कोई अकेली नहीं है। फिलीपींस के तूफान हों, सोमालिया का सूखा, या कैलिफ़ोर्निया की आग – जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में लोगों को बेघर कर रहा है।
लेकिन पहाड़ों में यह बदलाव और भी गहरा है – धीरे, चुपचाप और स्थायी।
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