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बांग्लादेश: प्रतिबंध की चपेट में शेख हसीना की पार्टी, जानें क्या है अवामी लीग का इतिहास

बांग्लादेश में राजनीतिक घटनाक्रम ने एक नया मोड़ ले लिया है। देश की अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं, ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई आतंकवाद निरोधी कानून के तहत की गई है। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक राजनीतिक दल के अतीत से वर्तमान तक की कहानी।

🔹 कब और कैसे बनी थी पार्टी?

आवामी लीग की स्थापना 23 जून 1949 को ढाका में हुई थी, जब बांग्लादेश “पूर्वी पाकिस्तान” कहलाता था। पहले इसका नाम ‘पूर्वी पाकिस्तान आवामी मुस्लिम लीग’ था, जिसे बाद में धर्मनिरपेक्षता की ओर बढ़ते हुए केवल ‘आवामी लीग’ कर दिया गया। इस संगठन के संस्थापक नेताओं में मौलाना अब्दुल हमीद खान भाशानी, शमसुल हक और हुसैन शहीद सुहरावर्दी जैसे नाम प्रमुख हैं।

🔹 विचारधारा और प्रारंभिक संघर्ष

इस पार्टी ने बंगाली पहचान, सांस्कृतिक स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया। इसकी राजनीति लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और राष्ट्रवाद जैसे मूल्यों पर आधारित रही है।

🔹 शेख मुजीब और मुक्ति संग्राम

आवामी लीग को राष्ट्रीय पहचान मिली जब शेख मुजीबुर रहमान ने इसका नेतृत्व संभाला। उन्हें “बंगबंधु” यानी “बंगाल का मित्र” कहा जाता है। 1970 में आम चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान में पार्टी को भारी जीत मिली, लेकिन सत्ता के हस्तांतरण से इनकार किए जाने के बाद आंदोलन शुरू हुआ, जिसने 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।

🔹 आज़ादी के बाद की भूमिका

1971 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शेख मुजीब देश के पहले प्रधानमंत्री बने। लेकिन 1975 में सैन्य तख्तापलट में उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद पार्टी को लंबे समय तक विपक्ष में रहना पड़ा।

🔹 वर्तमान नेतृत्व और विवाद

आज शेख हसीना, शेख मुजीब की बेटी, पार्टी की प्रमुख हैं। उन्होंने 1996–2001 और फिर 2009 से लगातार प्रधानमंत्री पद संभाला है। हसीना के नेतृत्व में देश की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में काफी प्रगति हुई है। हालांकि, उनके कार्यकाल में सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने, विपक्ष को दबाने और सत्ता केंद्रीकरण के आरोप भी लगे हैं।

🔹 ताज़ा घटनाक्रम

अब आतंकवाद निरोधक कानून के तहत पार्टी पर प्रतिबंध लगाना बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इस पर व्यापक प्रतिक्रिया और राजनीतिक तनाव की संभावना जताई जा रही है।

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