नई दिल्ली।
मोदी सरकार अब सस्ती दवाएं केवल भारत तक ही सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि पूरी दुनिया के गरीब और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना चाहती है। इसके लिए भारत ने एक ग्लोबल नेटवर्क बनाने की पहल की है, जिसमें 24 देशों के नीति निर्माता और दवा नियामक भारत के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
‘वन अर्थ-वन हेल्थ’ मुहिम को मिली रफ्तार
भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) और विदेश मंत्रालय के सहयोग से ‘वन अर्थ-वन हेल्थ’ अभियान के तहत यह अंतरराष्ट्रीय बैठक 16 से 19 जून तक दिल्ली में आयोजित की गई। इसमें चिली, केन्या, क्यूबा, बारबाडोस, रवांडा, जमैका, कनाडा जैसे देशों ने भाग लिया।
इस बैठक का उद्देश्य यह है कि दुनिया के सभी लोगों को गुणवत्तापूर्ण और सस्ती दवाएं मिल सकें, चाहे वे किसी भी देश या तबके से हों।
भारत का मॉडल बन रहा उदाहरण
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में गंभीर बीमारियों की महंगी दवाओं को बेहद कम कीमतों में तैयार कर मिसाल पेश की है।
उदाहरण:
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टाइरोसिनेमिया टाइप-A (लीवर की बीमारी) की दवा विदेश से मंगाने पर 2.2 करोड़ रुपये लगते थे, भारत ने वही दवा सिर्फ 2.5 लाख रुपये में तैयार कर दी।
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विल्सन डिजीज की दवा विदेश में 1.8 से 3.6 करोड़ की है, भारत में 3 से 6 लाख में मिल रही है।
जन औषधि केंद्रों की सफलता
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जन औषधि केंद्रों पर दवाएं बाजार कीमत से 50% से 90% सस्ती मिलती हैं।
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कैंसर की एक दवा जो बाजार में ₹6,500 में मिलती है, वह केंद्रों पर ₹800 में उपलब्ध है।
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भारत में अब तक 1.75 लाख से ज्यादा आयुष्मान आरोग्य केंद्र खुल चुके हैं, जहां मुफ्त दवाएं और इलाज मिलते हैं।
भारत की दवा ताकत
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अमेरिका में बिकने वाली 14% जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं।
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भारत में बनी 70% जेनेरिक दवाओं का निर्यात होता है।
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WHO द्वारा उपयोग किए जाने वाले 70% टीके भारत से मिलते हैं।
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15 देशों ने भारतीय फार्माकोपिया (दवाओं के मानक की किताब) को आधिकारिक रूप से अपनाया है।
निष्कर्ष
भारत की यह पहल न सिर्फ अपने देश के गरीबों को राहत दे रही है, बल्कि अब दुनिया के कई देशों को भी महंगी बीमारियों के इलाज के लिए सस्ती और असरदार दवाएं दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है। यह भारत की स्वास्थ्य कूटनीति की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
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