Breaking News
india-russia-china

भारत को रूस की चेतावनी या असुरक्षा? एक रणनीतिक संदेश के पीछे की असली चिंता

नई दिल्ली / मास्को – हाल ही में रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव ने पश्चिमी देशों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे एशिया में भारत और चीन के बीच तनाव को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा था कि “इंडो-पैसिफिक” शब्द का प्रयोग केवल चीन विरोधी नीतियों को आगे बढ़ाने और क्षेत्रीय प्रभुत्व कायम करने का पश्चिमी प्रयास है।

लावरोव के इस बयान को भारत के लिए एक चेतावनी के तौर पर भी देखा जा रहा है और रूस की अपनी रणनीतिक चिंताओं का भी प्रतिबिंब माना जा रहा है।


क्या वास्तव में भारत चीन-विरोधी मोहरा है?

लावरोव ने कहा, “पश्चिम, खासकर अमेरिका, भारत को चीन के खिलाफ मोहरे की तरह इस्तेमाल करना चाहता है।” रूस पहले भी क्वॉड गठबंधन (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) को चीन विरोधी मानता रहा है। यह गठबंधन, हालांकि, औपचारिक रूप से सुरक्षा संगठन नहीं है, फिर भी रूस और चीन दोनों इसे सैन्य व रणनीतिक घेराबंदी के रूप में देखते हैं।

दिल्ली स्थित विशेषज्ञ डॉ. राजन कुमार का मानना है कि रूस की चिंता केवल भू-राजनीतिक नहीं है, बल्कि सैन्य और व्यापारिक संबंधों में भारत की पश्चिम की ओर झुकाव भी उन्हें परेशान कर रहा है। रूस से भारत का हथियार आयात 2013 में जहां 76% था, वह 2023 तक गिरकर 36% रह गया है।


पश्चिम पर हमला, लेकिन भारत को चेतावनी?

विश्लेषकों का कहना है कि लावरोव की यह टिप्पणी रूस की बेचैनी दिखाती है कि भारत धीरे-धीरे रूस से दूर और पश्चिम के करीब जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, रूस अब चीन का कनिष्ठ भागीदार बन चुका है, इसलिए भारत को चीन से रक्षा के लिए रूस की मदद पर भरोसा करना व्यवहारिक नहीं होगा।

डॉ. राजन कुमार कहते हैं, “भारत को यह अहसास है कि सीमा विवाद और सैन्य टकराव की स्थिति में अमेरिका और उसके सहयोगी अधिक सहयोगी हो सकते हैं, जबकि रूस की भूमिका सीमित रहेगी।”


इतिहास गवाह है: 1962 में भी रूस रहा मौन

1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान सोवियत संघ (अब रूस) ने भारत का खुलकर समर्थन नहीं किया था। उस समय चीन और सोवियत संघ के बीच वैचारिक मतभेद जरूर थे, लेकिन सोवियत नेतृत्व ने चीन को नाराज़ करने से परहेज़ किया।

लेखक बर्टिल लिंटनर और पत्रकार मोहन राम दोनों ने इस ऐतिहासिक संकोच का उल्लेख किया है — जब भारत ने मदद मांगी तो सोवियत संघ ने दूरी बनाए रखी। युद्ध के दौरान भारत को मजबूरी में अमेरिका और ब्रिटेन से मदद लेनी पड़ी।


यूक्रेन युद्ध का असर और भारत की ‘रणनीतिक संतुलन’ नीति

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत ने एक जटिल नीति अपनाई है — उसने यूक्रेन की संप्रभुता का समर्थन तो किया है लेकिन रूस के साथ अपने रिश्ते भी बनाए रखे हैं। इससे रूस को यह उम्मीद है कि भारत उसके साथ रहेगा, वहीं अमेरिका चाहता है कि भारत पूरी तरह से रूस से दूरी बना ले।

ऐसे में रूस को भारत का पश्चिम की ओर झुकना नागवार गुजर रहा है और वह इसे भारत की स्वायत्त विदेश नीति में सेंध मानता है।


रूस-पाकिस्तान समीकरण और भारत की असमंजस

हाल ही में भारत-पाकिस्तान के बीच जब सैन्य कार्रवाई हुई, तब न अमेरिका और न ही रूस ने भारत का स्पष्ट समर्थन किया। इसके उलट चीन खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा था।

यह घटनाक्रम दिखाता है कि भारत आज भी वैश्विक कूटनीति में अकेले फैसले लेने की स्थिति में है और किसी भी धड़े में पूरी तरह समर्पण से बचता रहा है। यह भारत की बढ़ती रणनीतिक प्रासंगिकता का संकेत भी है, और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दुविधा का भी।


निष्कर्ष: आगाह करने की कोशिश या अपने डर की अभिव्यक्ति?

रूस का यह बयान भारत को कोई नया संदेश नहीं देता, बल्कि उसकी अपनी चिंताओं का प्रतिबिंब है। भारत को पश्चिम से जो रणनीतिक समर्थन मिल रहा है, वह उसकी भौगोलिक चुनौतियों का परिणाम है — न कि किसी खेमे में जाने की मंशा।

भारत आज भी स्वतंत्र कूटनीति पर कायम है, लेकिन उसे यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि सुरक्षा की दृष्टि से विकल्पों की विविधता जरूरी है — और रूस, चाहे ऐतिहासिक मित्र हो, हर परिस्थिति में मददगार नहीं होगा।

About Chandni Khan

Check Also

homuz

ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी की: अमेरिकी सूत्र

वॉशिंगटन:ईरान ने जून महीने में फारस की खाड़ी में अपने जहाजों पर समुद्री बारूदी सुरंगें …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Channel 009
help Chat?