विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भारत और चीन के रिश्तों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उनका कहना है कि दोनों देश एक साथ विकास कर रहे हैं और इस प्रक्रिया में एक नया रणनीतिक संतुलन बन रहा है। उनका यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में काफी अहम माना जा रहा है।
‘दुनिया में बन रहा जटिल संतुलन’
जयशंकर ने कहा कि आज वैश्विक राजनीति में जटिल समीकरण बनते जा रहे हैं, क्योंकि भारत और चीन जैसे बड़े पड़ोसी देश एक साथ उभर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह स्थिति सिर्फ सीमा या व्यापार से जुड़ी नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अंतर भी भूमिका निभा रहे हैं।
‘भारत और चीन दो समानांतर सभ्यताएँ’
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और चीन दोनों लंबे इतिहास और समृद्ध परंपराओं वाले देश हैं। दोनों का विकास समानांतर रूप से हो रहा है, लेकिन उनके सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में काफी अंतर है। उन्होंने कहा, “हम दो ऐसे देश हैं जिनकी आबादी एक अरब से ज्यादा है, जो सिर्फ जनसंख्या में ही नहीं, बल्कि संस्कृति और नीति में भी भिन्न हैं।”
सीमा विवाद अब भी एक बड़ी चुनौती
जयशंकर ने माना कि भारत-चीन के बीच सीमा विवाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और यह दोनों देशों के संबंधों में एक अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा, “चीन हमारा निकटतम और सबसे बड़ा पड़ोसी है, लेकिन दोनों देशों की सीमा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यह स्वाभाविक रूप से हमारे रिश्तों पर असर डालता है।”
यूरोप के रुख में आया बदलाव
जयशंकर ने चीन के प्रति यूरोप के दृष्टिकोण पर भी बात की। उन्होंने बताया कि पिछले 10–15 वर्षों में यूरोपीय देशों के नजरिए में बदलाव आया है। पहले जहाँ चीन के प्रति अधिक उदारता थी, अब कुछ देश अधिक सतर्क हो गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि यूरोप एक समान सोच के साथ आगे नहीं बढ़ रहा और सभी देशों की स्थिति व नीति भिन्न हैं।
रूस-चीन की तुलना पर दर्शकों में हँसी
साक्षात्कार के दौरान जब उनसे यह पूछा गया कि क्या चीन को लेकर यूरोप का नजरिया वैसा ही है जैसा रूस को लेकर पहले था, तो जयशंकर ने मुस्कुराते हुए सहमति जताई। उन्होंने कहा, “ठीक है, आपने सही कहा! मैं असहमत नहीं हूं।” यह सुनकर दर्शकों में हल्की हँसी गूंज उठी।
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