भिलवाड़ा में जिंदल सॉ लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित ओवरब्रिज छह अधिकारियों की लापरवाही के कारण नहीं बन पाया। इनकी वजह से ओवरब्रिज पर खर्च होने वाले 30 करोड़ रुपये का सही उपयोग भी नहीं हो सका। पत्रिका की जांच में सामने आया कि एनजीटी ने कलक्टर से अंडरपास की समीक्षा करने को कहा था, और अधिकारियों ने ओवरब्रिज की बजाय तीन अंडरपास बनाने की सहमति दे दी, जिससे जिंदल को फायदा मिल गया।
कौन-कौन थे जिम्मेदार अधिकारी
5 दिसंबर 2017 की बैठक में शामिल अधिकारी: अजमेर रेलवे के महेशचंद मीणा, नगर विकास न्यास सचिव आशीष कुमार शर्मा, आयुक्त रविन्द्रसिंह, जिंदल प्रतिनिधि राजेन्द्र गौड, अधिशासी अभियंता योगेश माथुर और सहायक अभियंता अखेराम बडोदिया। इन सभी ने तीन अंडरपास की मंजूरी दी, जिससे शहर को ओवरब्रिज से वंचित रहना पड़ा।
घटनाक्रम की प्रमुख तिथियां:
- 15 जून 2017: परिषद ने जिंदल को रेलवे के लिए 21.74 लाख जमा कराने का नोटिस दिया।
- 25 जुलाई 2017: एनजीटी ने इस नोटिस पर रोक लगा दी।
- 17 अगस्त 2017: आयुक्त रविन्द्रसिंह ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की सलाह मांगी।
- 24 अक्टूबर 2017: एसएलपी दाखिल करने के लिए वकील नियुक्त किया गया।
- 27 अक्टूबर 2017: आयुक्त रविन्द्र को प्रभारी बनाया गया।
- 28 अक्टूबर 2017: अपील के लिए 1.10 लाख रुपये मांगे गए।
- 01 नवंबर 2017: सुप्रीम कोर्ट में आयुक्त ने शपथ पत्र दिया।
- 06 नवंबर 2017: अपील की फीस का भुगतान हुआ।
कैसे बदला मामला:
- 11 सितंबर 2017: एनजीटी ने कहा कि तीन अंडरपास बनने से ओवरब्रिज की जरूरत नहीं रहेगी और कलक्टर से इस पर समीक्षा मांगी।
- 5 दिसंबर 2017: बैठक में ओवरब्रिज की चर्चा छोड़कर तीन अंडरपास (पुलिस लाइन, साबुन मार्ग, रामधाम) की सहमति दी गई।
- 23 अप्रैल 2018: सुप्रीम कोर्ट ने बैठक के फैसले को सही मानते हुए अपील खारिज कर दी।
- 25 अप्रैल 2019: एनजीटी ने अंडरपास का काम पूरा होने पर मामला निपटाया।
- 9 जुलाई 2019: एनजीटी ने जिंदल को 21.70 लाख रुपये लौटाए और मामला बंद कर दिया।
इस पूरी प्रक्रिया में अधिकारियों की लापरवाही के कारण भिलवाड़ा को ओवरब्रिज नहीं मिल सका।
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