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बिलासपुर के मां महामाया मंदिर के पवित्र कुंड में कछुओं के घायल और मृत मिलने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। पिछले एक साल में करीब 30 कछुओं की मौत हो चुकी थी। हाल ही में चार और कछुए मृत मिले हैं। इससे श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है।
शरीर पर मिले चोट के निशान
कुछ कछुओं के शरीर और खोल पर चोट के निशान पाए गए हैं। इससे शक जताया जा रहा है कि उन्हें किसी ने नुकसान पहुंचाया हो सकता है। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और मृत कछुओं का पोस्टमार्टम कराया। शुरुआती जांच में बाहरी चोट, पानी में प्रदूषण या जहरीले तत्व की संभावना से इनकार नहीं किया गया है। विभाग का कहना है कि पूरी रिपोर्ट आने के बाद ही असली कारण स्पष्ट होगा।
प्राकृतिक मौत या मानवीय लापरवाही?
वन्य जीव विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कछुओं के शरीर पर चोट के निशान हैं, तो यह प्राकृतिक मौत नहीं हो सकती। कुंड में डाला जाने वाला प्रसाद, प्लास्टिक या रसायनयुक्त सामग्री भी जल जीवों के लिए हानिकारक हो सकती है। पिछले साल भी कछुओं की मौत के मामले में कुछ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी।
जांच रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछली घटना की जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई। लगातार हो रही मौतों से यह सवाल उठ रहा है कि जिम्मेदार कौन है और कार्रवाई कब होगी। लोगों ने कुंड की सुरक्षा बढ़ाने, सीसीटीवी कैमरे लगाने और नियमित निगरानी की मांग की है।
तालाब की सफाई में अहम भूमिका
कछुए तालाब को साफ रखने में मदद करते हैं। वे सड़ने वाले पदार्थ, मरी मछलियां और कचरा खाकर पानी को स्वच्छ रखते हैं। वे काई और जलीय पौधों की बढ़ोतरी को भी नियंत्रित करते हैं, जिससे पानी का संतुलन बना रहता है। इसलिए कछुओं का स्वस्थ रहना जरूरी है।
विशेषज्ञ की सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि कुंड के पानी की हर 6 से 12 महीने में जांच करानी चाहिए। पानी में रासायनिक तत्वों की कमी या अधिकता भी कछुओं की मौत का कारण बन सकती है। साथ ही जलीय पौधों की उपलब्धता, साफ-सफाई और प्लास्टिक पर नियंत्रण जरूरी है। प्रबंधन को इन सभी बातों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि कुंड और वहां के जीव सुरक्षित रह सकें।
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