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“मूल्यों का आत्मसमर्पण”: ईरान-इज़राइल संघर्ष पर सोनिया गांधी का केंद्र पर हमला

नई दिल्ली:
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने भारत सरकार की ईरान-इज़राइल युद्ध पर चुप्पी को न केवल कूटनीतिक विफलता, बल्कि भारत की नैतिक और रणनीतिक परंपराओं से विचलन बताया है। एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र में लिखे Op-Ed लेख में उन्होंने इज़राइल द्वारा 13 जून को ईरान पर किए गए हमले को “अवैध” और “संप्रभुता का उल्लंघन” बताया।


“भारत को बोलना चाहिए था, लेकिन उसने चुप्पी चुन ली”

सोनिया गांधी ने लिखा:

“भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इन हमलों और ईरानी धरती पर लक्षित हत्याओं की कड़ी निंदा की है। यह क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है और निर्दोष नागरिकों के जीवन की कोई परवाह नहीं दिखती।”

लेख में उन्होंने भारत की परंपरागत गुटनिरपेक्ष नीति और पश्चिम एशिया में संतुलित दृष्टिकोण की बात की, जो हाल के वर्षों में “दबाव और चुप्पी” में बदल गया है।


ईरान-इज़राइल संघर्ष और परमाणु वार्ता

  • इज़राइल के हमले से कुछ ही दिन पहले ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता में प्रगति की उम्मीद जगी थी।

  • लेकिन इस हमले से “डिप्लोमेसी पटरी से उतर गई”, उन्होंने लिखा।


नेटन्याहू और ट्रंप पर निशाना

सोनिया गांधी ने इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नीतियों को “विरोध और नफरत को भड़काने वाला” बताया और 1995 में इस्राइली प्रधानमंत्री इत्झाक रबिन की हत्या का संदर्भ भी दिया।

वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी उन्होंने निशाना साधते हुए लिखा:

“जो राष्ट्रपति सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ की आलोचना करते थे, वही अब उसी राह पर चल पड़े हैं जैसे 2003 के इराक युद्ध के समय हुआ था।”


भारत की कूटनीतिक स्थिति और ईरान से रिश्ते

उन्होंने याद दिलाया कि:

  • ईरान ने 1994 में जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर भारत का साथ दिया था, जब UN में एक प्रस्ताव को ब्लॉक किया गया था।

  • चाबहार पोर्ट और नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे आर्थिक हित भी अमेरिका के 2018 में JCPOA से हटने से प्रभावित हुए।


गाज़ा, दो-राज्य समाधान और भारत की भूमिका

सोनिया गांधी ने लिखा:

“गाज़ा में 55,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, बस्तियां तबाह हो चुकी हैं, और खाद्य संकट गहराता जा रहा है। इसके बीच भारत की चुप्पी बेहद चिंताजनक है।”

उन्होंने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने भारत की दो-राज्य समाधान की नीति से “मुँह मोड़ लिया” है।


“अब भी देर नहीं हुई है”

लेख के अंत में उन्होंने भारत से अपील की कि वह:

  • स्पष्ट बयान दे,

  • जिम्मेदारी से कूटनीतिक पहल करे, और

  • पश्चिम एशिया में शांति और संवाद की वापसी सुनिश्चित करे।


ईरानी राजनयिक की भारत से अपील

सोनिया गांधी का यह लेख ऐसे समय आया है जब भारत में ईरान के उप मिशन प्रमुख मोहम्मद जवाद होसेनी ने भी शुक्रवार को प्रेस ब्रीफिंग में कहा:

“इज़राइल के हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं। भारत को न केवल अपने रिश्तों के आधार पर, बल्कि वैश्विक सिद्धांतों के समर्थन में इस पर आपत्ति जतानी चाहिए।”


निष्कर्ष:
सोनिया गांधी का यह लेख न सिर्फ मौजूदा सरकार की विदेश नीति पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि भारत की ऐतिहासिक भूमिका की भी याद दिलाता है — एक ऐसी आवाज़ जो हमेशा न्याय, मानवता और संतुलन के पक्ष में रही है।

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