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मोसाद का महान जासूस जिसे सीरिया ने दी थी चौराहे पर फांसी — एली कोहेन की अनकही दास्तान

यरुशलम/तेल अवीव: इज़राइल की प्रतिष्ठित खुफिया एजेंसी मोसाद की कहानी जासूसी की दुनिया में मिसाल मानी जाती है। मोसाद के कई नामी एजेंट हुए हैं, लेकिन एली कोहेन को आज भी इज़राइल का राष्ट्रीय नायक माना जाता है। 1960 के दशक में उन्होंने सीरिया में गुप्त रूप से इतना गहरा नेटवर्क बना लिया था कि वह वहाँ के रक्षा मंत्री के सलाहकार तक बन गए थे। लेकिन 18 मई 1965 को दमिश्क के एक व्यस्त चौराहे पर, सार्वजनिक रूप से उन्हें फांसी दे दी गई थी।

60 साल बाद सीरिया से लौटे एली कोहेन से जुड़े दुर्लभ साक्ष्य

हाल ही में मोसाद द्वारा चलाए गए एक गोपनीय अभियान में एली कोहेन से जुड़ी करीब 2,500 वस्तुएं इज़राइल वापस लाई गईं। इन वस्तुओं में उनके हस्तलिखित पत्र, सीरियाई खुफिया एजेंसी द्वारा जब्त की गई डायरी, फोटोज़, रिकॉर्डिंग, और मिशन के दौरान इस्तेमाल किए गए फर्जी दस्तावेज भी शामिल हैं। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ये ऐतिहासिक सामग्रियां एली की पत्नी नादिया कोहेन के साथ साझा कीं।

नादिया कोहेन ने की थी अंतरराष्ट्रीय अपील

इन दस्तावेज़ों में वे चिट्ठियाँ भी शामिल हैं जो नादिया कोहेन ने दुनियाभर के नेताओं को लिखी थीं, ताकि उनके पति को रिहा कराया जा सके। इसके अलावा, दमिश्क स्थित उनके अपार्टमेंट की चाबियां, पासपोर्ट और इज़राइली मिशन से जुड़े दस्तावेज़ भी इस संग्रह का हिस्सा हैं।

जासूसी जिसने युद्ध की दिशा बदल दी

एली कोहेन द्वारा सीरिया से भेजी गई खुफिया जानकारियों का असर इतना गहरा था कि उन्हें 1967 के अरब-इज़राइल युद्ध (सिक्स डे वॉर) में इज़राइल की निर्णायक जीत में एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। वे सीरिया की राजनीति, सैन्य रणनीति और आंतरिक हलचलों तक की जानकारी इज़राइली नेतृत्व तक पहुँचाते थे।

एक असाधारण जासूस की असामान्य विरासत

जब एली कोहेन को जासूसी करते पकड़ा गया, तो सीरिया की अदालत ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई। उनकी फांसी आज भी इज़राइलियों के दिलों में एक वेदना और गर्व की भावना पैदा करती है। उनके अवशेष अब तक इज़राइल को वापस नहीं मिले हैं, लेकिन उनके बलिदान और बहादुरी की कहानियाँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं।

प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा, “एली कोहेन केवल एक जासूस नहीं थे — वे इज़राइल के इतिहास के सबसे महान गुप्त एजेंट थे। मोसाद और हमारा राष्ट्र हमेशा उनके बलिदान का ऋणी रहेगा।”

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