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संदीप पाटिल का बुमराह और वर्कलोड मैनेजमेंट पर बड़ा बयान – “हम चोट खाकर भी खेलते थे”

भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह हाल ही में इंग्लैंड दौरे पर चर्चा में रहे। इस दौरे में उन्होंने 5 में से सिर्फ 3 टेस्ट मैच खेले। वर्कलोड मैनेजमेंट की वजह से उन्हें दो मैचों – एजबेस्टन और द ओवल – से बाहर रखा गया। दिलचस्प बात यह है कि भारत ने वही दोनों मैच जीते, जिनमें बुमराह नहीं खेले थे, जबकि बाकी तीन मैचों में टीम को दो हार और एक ड्रॉ मिला।

इसी मुद्दे पर टीम इंडिया के पूर्व क्रिकेटर और 1983 वर्ल्ड कप विजेता संदीप पाटिल ने बीसीसीआई और मौजूदा वर्कलोड नीति पर कड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि उनके समय में खिलाड़ियों से उम्मीद की जाती थी कि वे देश के लिए हमेशा मैदान में उतरें, चाहे चोट हो या थकान।

संदीप पाटिल ने कहा कि उनके दौर में और जब वे चयन समिति के अध्यक्ष थे, तब कभी भी “वर्कलोड मैनेजमेंट” जैसी चीज पर विचार नहीं किया गया। उनका मानना है कि बड़ी सीरीज में टीम के मुख्य खिलाड़ियों को आराम देना सही नहीं है, क्योंकि ऐसे वक्त पर देश को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा  “हैरानी की बात है कि बीसीसीआई इन चीजों को मंजूरी दे रहा है। अब तो ऐसा लगने लगा है जैसे कोच या कप्तान से ज्यादा फिजियो की बात सुनी जाती है। क्या अब फिजियो भी सिलेक्शन मीटिंग में बैठेगा और वही तय करेगा कौन खेलेगा और कौन नहीं?”

पाटिल ने अपने समय के खिलाड़ियों का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने सुनील गावस्कर को लगातार पांच दिन बल्लेबाजी करते और कपिल देव को टेस्ट मैचों में लगभग हर दिन गेंदबाजी करते देखा है। कपिल देव नेट्स पर भी खूब गेंदबाजी करते थे और कभी ब्रेक की मांग नहीं करते थे। उनका करियर 16 साल से ज्यादा चला और वे हमेशा मैदान पर उपलब्ध रहे।

उन्होंने अपने करियर की एक घटना भी याद की – “1981 में ऑस्ट्रेलिया में मेरे सिर पर चोट लगी थी, लेकिन उसके बाद मई टेस्ट में मैं फिर से खेलने उतरा। उस समय कोई रिहैब प्रोग्राम नहीं होता था। हम चोटिल होने के बावजूद भी खेलते थे, क्योंकि हमें देश के लिए खेलकर खुशी मिलती थी, न कि कोई ड्रामा।”

पाटिल के बयान साफ तौर पर जसप्रीत बुमराह और मौजूदा क्रिकेट कल्चर पर निशाना थे। उनका मानना है कि आज के समय में खिलाड़ी फिटनेस और इंजरी के नाम पर कई बड़े मैच मिस कर देते हैं, जबकि पहले के खिलाड़ी सीमित संसाधनों में भी पूरा दमखम लगाते थे।

पाटिल का यह बयान क्रिकेट जगत में एक नई बहस छेड़ सकता है – क्या वर्कलोड मैनेजमेंट खिलाड़ियों के करियर को लंबा करने के लिए जरूरी है, या फिर यह टीम की जीत की संभावनाओं को कमजोर करता है?

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