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सम्राट कैबिनेट में मंगल पांडेय आउट, शैलेंद्र-मिथिलेश-श्वेता इन; भाजपा की नई सोशल इंजीनियरिंग शुरू
पटना। बिहार की नई सरकार के गठन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा कैबिनेट में शामिल और बाहर किए गए चेहरों को लेकर हो रही है। इनमें सबसे बड़ा नाम मंगल पांडेय का है। लंबे समय से भाजपा के भरोसेमंद और अनुभवी नेता माने जाने वाले मंगल पांडेय को इस बार सम्राट कैबिनेट में जगह नहीं मिली। सवाल उठ रहा है कि आखिर बंगाल में पार्टी के लिए अहम भूमिका निभाने के बावजूद उन्हें मंत्री पद का इनाम क्यों नहीं मिला?
राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि नई कैबिनेट का गठन केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीति, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और संगठनात्मक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया है। भाजपा नेतृत्व इस बार नए चेहरों को आगे लाकर संदेश देना चाहता है कि सरकार में नई ऊर्जा और नई टीम को मौका दिया जा रहा है।
मंगल पांडेय बिहार भाजपा के बड़े चेहरों में गिने जाते रहे हैं। वे संगठन और सरकार दोनों में अहम भूमिका निभा चुके हैं। बंगाल चुनाव में भी उनकी सक्रियता को लेकर चर्चा रही। लेकिन इस बार उन्हें कैबिनेट से बाहर रखने के फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। माना जा रहा है कि पार्टी उन्हें सरकार के बजाय संगठन या किसी दूसरी बड़ी जिम्मेदारी में उपयोग कर सकती है।
दूसरी ओर, शैलेंद्र, मिथिलेश और श्वेता जैसे चेहरों को मंत्री बनाए जाने को भाजपा की नई सोशल इंजीनियरिंग से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी ने इस बार ऐसे नेताओं को मौका दिया है, जिनके जरिए क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण साधे जा सकें। इससे सरकार में अलग-अलग वर्गों और इलाकों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई देती है।
शैलेंद्र को संगठन से जुड़े मजबूत चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। वहीं मिथिलेश की एंट्री को क्षेत्रीय संतुलन और जातीय समीकरण के लिहाज से अहम माना जा रहा है। श्वेता को मंत्री बनाना महिलाओं और नए चेहरों को आगे लाने की रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सम्राट कैबिनेट में विभाग और चेहरे चुनने के पीछे भाजपा की लंबी रणनीति है। पार्टी पुराने और अनुभवी नेताओं को पूरी तरह किनारे नहीं कर रही, बल्कि कुछ चेहरों को सरकार से हटाकर संगठन या चुनावी प्रबंधन की भूमिका में ला सकती है। वहीं सरकार में ऐसे चेहरों को जगह दी गई है, जो आने वाले चुनावों में नए सामाजिक समीकरण बनाने में मदद कर सकें।
विपक्ष इस फैसले को भाजपा के अंदरूनी असंतोष और गुटबाजी से जोड़ रहा है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि पार्टी के पुराने नेताओं को दरकिनार कर नई टीम बनाना अंदरूनी खींचतान का संकेत है। हालांकि भाजपा समर्थकों का दावा है कि यह फैसला पूरी तरह रणनीतिक है और इससे सरकार की कार्यशैली ज्यादा तेज और संतुलित होगी।
फिलहाल मंगल पांडेय का नाम कैबिनेट से कटना बिहार की राजनीति में बड़ी चर्चा बन गया है। अब देखना होगा कि पार्टी उन्हें आगे कौन-सी जिम्मेदारी देती है और नए मंत्री अपनी भूमिका में कितना असर छोड़ पाते हैं।
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