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कांकेर की होली का ऐतिहासिक महत्व
कांकेर में होलिका दहन की परंपरा हजार साल पुरानी है। पुराने समय में यहां के कंडरा राजा गढ़िया पहाड़ पर रहते थे, और उनकी प्रजा भी वहीं बसती थी। उस समय पहली बार गढ़िया पहाड़ के नीचे होलिका दहन किया गया था। यह परंपरा आज भी निभाई जाती है।
पुरानी होली और आज की होली में अंतर
पुराने लोग 65 साल पहले की होली को आज भी याद करते हैं। तब होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि मिलन, दोस्ती और आपसी मनमुटाव खत्म करने का अवसर हुआ करता था।
- तब प्राकृतिक रंगों और देसी मिठाइयों का चलन था।
- 19वीं-20वीं सदी तक पीतल की पिचकारियों से रंग खेला जाता था।
- 1960 तक टेसू (पलाश) के फूलों से बने रंग और शुद्ध मिठाइयों का महत्व था।
- लोग बिना किसी भेदभाव के मिठाइयां और खुशियां बांटते थे।
महाराजा भानु प्रताप देव और कांकेर की होली
महाराजा भानु प्रताप देव के समय कांकेर की होली बहुत भव्य हुआ करती थी। वे महल और मंदिरों में होली कार्यक्रमों में शामिल होते और फिर अपने खास मित्र हबीब सेठ के घर जाते थे।
- दोनों मित्र होली के दिन ही मिलते थे।
- सिनेमा हॉल में उनकी कुर्सियां भी हमेशा पास-पास रखी जाती थीं।
- वे शुद्ध मिठाइयों का आनंद लेते थे और जब महाराजा की कार वापस लौटती, तो इसे होली के समापन का संकेत माना जाता था।
1960 के बाद होली का बदलता स्वरूप
- हबीब सेठ के निधन (1960) के बाद होली की चमक फीकी पड़ने लगी।
- प्लास्टिक की पिचकारियां और केमिकल वाले रंगों का इस्तेमाल बढ़ने लगा।
- अब सिर्फ होली की रस्म अदायगी बची है, पहले जैसी मौज-मस्ती और मेल-मिलाप नहीं रहा।
आज की होली और बीते समय की होली
बुजुर्गों के अनुसार, पहले होली सच्ची खुशियों का त्योहार थी, जहां सभी लोग एक ही रंग में रंग जाते थे। लेकिन आज केमिकल रंगों और मिलावटी मिठाइयों ने होली के मजे को कम कर दिया है।
📌 कांकेर की ऐतिहासिक होली की परंपरा को जीवित रखना हमारी जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसकी खुशियों का असली आनंद उठा सकें।
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