गाजा में चल रहे मानवीय संकट को लेकर दुनिया के 22 देशों ने इजरायल की नीतियों के खिलाफ संयुक्त रूप से आवाज उठाई है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में एक भी मुस्लिम देश शामिल नहीं है, जबकि परंपरागत रूप से मुस्लिम राष्ट्र फिलिस्तीन का खुला समर्थन करते आए हैं।
🚧 मदद के रास्ते में अब भी रोड़े?
इजरायल द्वारा गाजा पट्टी में सीमित मानवीय सहायता की अनुमति दिए जाने के बावजूद कई अंतरराष्ट्रीय आवाजें मानती हैं कि यह पर्याप्त नहीं है। आरोप है कि इजरायल की ओर से अब भी मदद के प्रवाह में रुकावटें डाली जा रही हैं, जिससे वहां भूख, बीमारी और विस्थापन का संकट और गहरा हो गया है।
🇪🇺 किन-किन देशों ने उठाई आवाज?
इजरायल की नीति की आलोचना करने वाले 22 देशों की सूची में कई प्रमुख यूरोपीय और एशियाई राष्ट्र शामिल हैं:
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यूरोप: जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, डेनमार्क, फिनलैंड, इटली, स्पेन, नॉर्वे, स्वीडन, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, आयरलैंड, आइसलैंड, लिथुआनिया, लातविया, नीदरलैंड, लग्ज़मबर्ग, एस्टोनिया
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अन्य: जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड
इन देशों का कहना है कि गाजा को मानवीय सहायता पहुंचाना न केवल जरूरी है, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी है।
❓ मुस्लिम देशों की अनुपस्थिति क्यों?
इस बयान में किसी भी मुस्लिम देश का नाम न होना आश्चर्य का विषय बना हुआ है। आमतौर पर इस्लामिक राष्ट्र, जैसे तुर्की, ईरान, इंडोनेशिया या खाड़ी देश, फिलिस्तीन के समर्थन में खुलकर बोलते हैं। लेकिन इस संयुक्त बयान से उनकी गैरहाजिरी ने अंतरराष्ट्रीय समीकरणों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
⚠️ इजरायल को दी गई चेतावनी
कुछ देशों—फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा—ने तो यहां तक कहा है कि यदि इजरायल गाजा में सहायता पहुंचने से रोकता है या सैन्य कार्रवाई बंद नहीं करता, तो वे प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने को मजबूर होंगे। इन देशों का मानना है कि हालात अगर नहीं बदले तो गाजा में मानवाधिकारों का संकट और गहराता जाएगा।
🗨️ नेतन्याहू ने दिया जवाब
इस चेतावनी का जवाब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तीखे शब्दों में दिया। उन्होंने कहा कि “अगर हम गाजा में हमास को कमजोर नहीं करेंगे, तो भविष्य में हमले और अधिक घातक होंगे।” नेतन्याहू का तर्क है कि सहायता के नाम पर राहत देने से हमास को फिर से ताकत मिल सकती है।
🔍 निष्कर्ष:
22 देशों का यह बयान दर्शाता है कि गाजा संकट पर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ रही है, लेकिन साथ ही यह भी उजागर करता है कि कुछ पारंपरिक समर्थक राष्ट्र अब इस मुद्दे पर पीछे हटते नजर आ रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे चलकर इस कूटनीतिक रस्साकशी में कौन से देश खुलकर स्टैंड लेते हैं और कौन कूटनीतिक दूरी बनाए रखते हैं।
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