थाईलैंड ने संभावित अमेरिकी टैरिफ की मार से बचने के लिए एक निर्णायक आर्थिक कदम उठाया है। देश की सरकार ने उपभोक्ता प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत आवंटित 157 अरब बाहट (लगभग 4.7 अरब डॉलर) के बजट को अब उन परियोजनाओं की ओर मोड़ दिया है जो निर्यात और उत्पादन को मज़बूत करेंगी और अमेरिकी टैरिफ के असर को कम कर सकेंगी।
जुलाई के बाद खतरा: 36% टैरिफ की तलवार
थाईलैंड इस समय एक अहम मोड़ पर खड़ा है। अगर जुलाई में अमेरिका के साथ टैरिफ राहत का कोई समझौता नहीं होता है, तो थाई उत्पादों को अमेरिकी बाजार में सीधे 36% टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है। वर्तमान में जहां कई देशों पर सिर्फ 10% आयात शुल्क लागू है, वहीं ट्रंप समर्थक व्यापार नीतियों के तहत थाईलैंड पर यह दर तीन गुना से ज्यादा बढ़ सकती है।
उपभोक्ता योजनाओं से कटौती, निवेश जाएगा निर्यात-आधारित क्षेत्रों में
थाई कैबिनेट का यह फैसला साफ संकेत देता है कि सरकार की मौजूदा प्राथमिकता घरेलू खपत को प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि निर्यात को स्थिर बनाए रखना और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहना है। इस पुनर्विन्यास के तहत फंड अब कृषि उत्पाद, वस्त्र उद्योग और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में लगाया जाएगा जो अमेरिका पर निर्भर हैं। सरकार का मानना है कि स्थायी समाधान के लिए दीर्घकालिक रणनीति ज़रूरी है।
राजनयिक कोशिशें जारी, लेकिन तैयारी पूरी
हालांकि थाईलैंड अभी भी अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते की संभावनाएं तलाश रहा है, लेकिन सरकार यह भी मानती है कि अगर बातचीत विफल होती है, तो भारी टैरिफ से उनके उत्पाद वैश्विक बाजार में अपना स्थान खो सकते हैं। इसलिए सरकार व्यवसायिक इकाइयों को पहले से तैयार रखने और वैकल्पिक रणनीतियों पर काम कर रही है।
टैरिफ संकट: सिर्फ थाईलैंड का नहीं, एशिया की चेतावनी
अमेरिका की यह सख्त व्यापार नीति सिर्फ थाईलैंड के लिए खतरे की घंटी नहीं है, बल्कि यह पूरा एशियाई बाजार प्रभावित कर सकती है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, निवेश और व्यापारिक संबंध इस फैसले से हिल सकते हैं। थाईलैंड की यह प्रतिक्रिया अब दूसरे देशों के लिए एक मिसाल बन सकती है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय दबावों से निपटने के लिए अंदरूनी संसाधनों का दोबारा नियोजन किया जाए।
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