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भारत-पाक तनाव के बीच इटली-पाकिस्तान संसदीय समझौता, मेलोनी की नीयत पर उठे सवाल

नई दिल्ली/रोम/इस्लामाबाद: भारत और पाकिस्तान के बीच जारी राजनयिक तनाव के बीच इटली और पाकिस्तान के बीच हुआ संसदीय सहयोग समझौता कई सवालों को जन्म दे रहा है। खासकर तब, जब इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी भारत के साथ निकटता और मित्रता की सार्वजनिक घोषणाएं करती रही हैं।

क्या मेलोनी ने बदले सुर?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई मौकों पर “दोस्त” कह चुकीं मेलोनी की सरकार का यह कदम राजनीतिक हलकों में हैरानी और असहजता का विषय बन गया है। भारत-पाक विवाद के संवेदनशील समय में इस तरह का समझौता, जिसे “संसदीय भागीदारी” के नाम पर किया गया है, भारत में विश्वासघात की तरह देखा जा रहा है।

क्या हुआ समझौते में?

पाकिस्तानी सीनेट के चेयरमैन सैयद यूसुफ रज़ा गिलानी ने इटली के चैंबर ऑफ डेप्युटीज के अध्यक्ष लोरेंजो फोंटाना से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच संसदीय स्तर पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक समझौते पर सहमति जताई। इस समझौते के तहत दोनों देशों के सांसदों के बीच दौरे, संवाद और अनुभव साझा करने जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा।

संदिग्ध समय, असहज संकेत

इस बैठक में अफगानिस्तान के हालात पर भी चर्चा की गई। गिलानी ने अफगानिस्तान को “भाईचारा वाला राष्ट्र” बताया और वहां स्थिरता की कामना की। इटली के प्रतिनिधि फोंटाना ने भी पाकिस्तान की यात्रा का निमंत्रण स्वीकार किया और कहा कि वे दोनों देशों के संसदों के बीच सहयोग को औपचारिक रूप देना चाहते हैं।

भारत में प्रतिक्रियाएं तीखी

भारतीय रणनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को “कूटनीतिक रूप से असंवेदनशील” और “अवसरवादी राजनीति” करार दिया जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यह समझौता ऐसे समय पर हुआ है जब भारत पाकिस्तान से लगातार सीमापार आतंकवाद, सुरक्षा उल्लंघनों और वैश्विक मंचों पर विरोध का सामना कर रहा है।

‘मित्र’ मेलोनी पर उठे सवाल

जॉर्जिया मेलोनी ने कई बार प्रधानमंत्री मोदी के साथ मित्रवत संबंधों की बात की है, लेकिन अब भारत में राजनीतिक विश्लेषक यह पूछ रहे हैं कि “क्या यह वही मित्रता है जिसका वादा किया गया था?” सोशल मीडिया पर भी इटली के इस निर्णय की तीव्र आलोचना हो रही है।


निष्कर्ष: क्या भारत को सतर्क हो जाना चाहिए?

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि वैश्विक मंच पर ‘मित्र’ देशों की नीयत कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता। भारत को अब अपनी विदेश नीति में और अधिक व्यावहारिक और सतर्क दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।

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